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तोता पांच मिनट में चट कर जाता है पेड़!

हरियाणा के जींद जिले में हर साल आने वाले पहाड़ी तोते किसानों के लाखों रूपए के बेर चट कर जाते हैं। बागवानों को पहाड़ी तोतों का खौफ दिसंबर खत्म होते ही बढ़ जाता है।
आमतौर पर इन तोतों का दिसंबर महीने से आना शुरू हो जाता है लेकिन जनवरी महीने में इनकी संख्या बढ़ जाती है। ये केवल बेर को ही नुकसान पहुंचाता है। तोते की चोंच इतनी पैनी होती है कि वह चंद सैकंड में ही बेर की गुठली को तोड़ कर उसके अंदर की गिरी को चट कर जाता है। दिसंबर माह में धुंध शुरू होते ही पहाड़ी तोते का आगमन शुरू हो जाता है।
शहर के विभिन्न हिस्सों में बेर के बाग हैं जो भी व्यक्ति बेर के बाग लेता है उसे सुबह से शाम तक बेर की रखवाली करनी पड़ती है। अधिकतर खेतों में तो किसान बेर के पेड़ के ऊपर चारपाई लगाकर तोते उड़ाने का काम करते हैं। किसानों की बातों पर अगर भरोसा किया जाए तो यह तोता देशी तोते से लंबा होता है और इसकी चोंच भी बड़ी होती है।
यदि मनुष्य की उंगली तोते की चोंच में आ जाए तो उंगली बचनी मुश्किल है क्योंकि जिस गुठली को व्यक्ति दांतों से तोड़ने की हिम्मत नहीं जुटाता उसे ये तोते सैकेंड में तोड़ देते हैं। पहाड़ी तोता अमरूद या अन्य वस्तुओं को नहीं खाता। बेरों के अंदर गुठली को तोड़कर उसकी गिरी खाता है। उमरी बेरों को ही यह तोता खाता है। कैथली बेरी के बेरों को यह ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाता।
कैथली बेरी के बेरों की गुठली पतली होती है और उसकी गिरी ज्यादा बेहतर नहीं होती। गिरी को खाने के चक्कर में बेर बर्बाद होते हैं। यह तोता गहरी धुंध में बेरों को खाने के लिए आता है और पांच मिनट में पूरे पेड़ को चट कर जाता है। यदि मौसम साफ हो तो इनकी संख्या नाम मात्र ही रह जाती है। ये तोते तेज आवाज से भागते हैं।

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