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मुर्गी पालन से दूर हो सकती है देश की गरीबी !

नई दिल्ली । रोजमर्रा के जीवन में थोड़ा हस्तक्षेप से देश के अत्यधिक गरीब लोगों की संपत्ति में 15 फीसदी, खपत में 26 फीसदी और बचत में 96 फीसदी वृद्धि हो सकती है। यह तथ्य छह देशों में सर्वाधिक गरीब 21 हजार लोगों के जीवन पर किए गए एक अध्ययन में सामने आया है।
मुर्गी, बकरी या ऐसे अन्य उत्पादों का कारोबार। पान के पत्ते और सब्जियां जैसे सामानों की बिक्री। ऐसे उत्पादों का उपयोग करने का प्रशिक्षण। संपत्ति को आपात स्थिति में बेचने से रोकने के लिए पैसे। मार्गदर्शन। स्वास्थ्य शिक्षा। 18 से 24 महीने के बीच बचत संबंधी सेवाएं। ये हस्तक्षेप 'ग्रेजुएशन मॉडल' के आधार पर किए गए, जिसके तहत अत्यधिक गरीब लोगों को गरीबी से बाहर निकलने में मदद की गई।
इस कार्यक्रम के अंत में इसमें शामिल लोगों के पास अधिक संपत्ति और बचत थी। उन्होंने अधिक समय तक काम किया। कम दिन भूखे रहना पड़ा। उनमें तनाव कम दिखा और उनके शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ। सभी छह देशों में शोधार्थियों ने 10,495 परिवारों पर अध्ययन किया। उन्होंने दो साल के कार्यक्रम में शामिल किए गए लोगों और कार्यक्रम में शामिल नहीं किए गए लोगों पर अध्ययन किया। एक साल बाद उन दोनों समूह के लोगों के जीवन में आए बदलाव की तुलना की।
शोधार्थियों ने पाया कि तीन साल बाद कार्यक्रम के लाभार्थियों के पास दूसरे के मुकाबले काफी अधिक संपत्ति थी। उन्होंने अधिक बचत की। उन्होंने अधिक समय तक काम किया। कम दिन भूखे रह कर गुजारे। उनमें तनाव कम दिखा और उनके शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ।
इंडियास्पेंड के मुताबिक, देश में 21.6 करोड़ लोग या 4.3 करोड़ परिवारों के पास कुछ भी संपत्ति नहीं है। इनमें से आठ करोड़ लोग या 1.6 करोड़ परिवार जनजातीय समूह के हैं। सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) जैसी कई सामाजिक सुरक्षा योजनाएं चला रही है।
इन पर 2013-14 में 47,014 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो 125 फीसदी बढ़कर 2015-16 में 1,06,115 करोड़ रुपये तक पहुंच गए हैं। जे-पीएएल अध्ययन के मुताबिक दो साल में शिक्षकों और स्वास्थ्यसेवा सहित प्रत्येक लाभार्थी पर करीब 20 हजार रुपये खर्च हुए। सरकार यदि रोजगार योजनाओं के तहत उन्हें 58 दिनों का रोजगार देती, तब भी इतना ही खर्च होता।
अध्ययन के बेहतर परिणाम के कारण एनजीओ साझेदार बंधन ने इस कार्यक्रम को छह राज्यों में फैला दिया है। कार्यक्रम के दायरे में पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, असम, त्रिपुरा और मध्य प्रदेश के 32,280 परिवार आ गए हैं। इस कार्यक्रम के दायरे में 20 और देशों को भी लाया जा रहा ।

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