संसद की कैंटीन में सबसे सस्ता खानाए 1 साल में 14 करोड़ की सब्सिडी !
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नई दिल्ली। क्या आप जानते हैं कि देश में सबसे सस्ता खाना कहां मिलता है। ये सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि एक आरटीआई के जरिए जानकारी में पता चला है कि साल भर में सांसदों और बाकी लोगों ने संसद में जो खाना खाया है उसपर 14 करोड़ रुपए की सब्सिडी दी गई। जहां प्रधानमंत्री लोगों से गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील करते हैंए लेकिन कैंटीन में इतना सस्ता खाना सांसद क्यों खाते हैं क्या उन्हें सब्सिडी नहीं छोड़ना चाहिए।
संसद के कैंटीन में फ्राइड फिश विद चिप्स की कीमत है 25 रुपएए चिकन करी. 29 रुपएए मटन करी 20 रुपए और मसाला डोसा 6 रुपए में मिलता है। क्या इतने कम कीमत पर कहीं इतना लजीज खाना मिल सकता है। संसद भवन की कैंटीनों में सस्ता खाना इसलिए है क्योंकि खाने पर सब्सिडी दी जाती है और ये कीमत लोकसभा सचिवालय चुकाता है। आरटीआई के जरिए जो सामने आया है उसे सुनकर आप हैरान परेशान रह जाएंगे।
आरटीआई के जरिए खुलासा हुआ है कि संसद की कैंटीनों में मसाला डोसा की कीमत सिर्फ 6 रुपए है जबकि इसे बनाने में 23 रुपए 26 पैसे का खर्च आता है। मटन करी 20 रुपए में मिलती है जबकि उसकी कीमत 61 रुपए 36 पैसे पड़ती है। ण्नॉनवेज थाली की कीमत 33 रुपए है मगर इसे बनाने में 99 रुपए लगते हैं। इसी तरह दाल फ्राई चार रुपए की मिलती है जबकि उसकी लागत 13 रुपए 11 पैसे है।
संसद भवन की कैंटीनों में खाने.पीने पर एक साल में 14 करोड़ रुपये से ज्यादा की सब्सिडी दी गई। संसद भवन परिसर में करीब आधा दर्जन कैंटीनों का संचालन उत्तरी रेलवे करता है। आरटीआई के जवाब में ये कहा गया कि संसद कैंटीन रेट में दिसंबर 2002ए अप्रैल 2003 और फिर दिसंबर 2010 में इजाफा किया गया था। हैरानी की बात है कि पिछले 5 साल में रेट में कोई बदलाव नहीं हुआ जबकि महंगाई लगातार बढ़ रही है।
लोकसभा सचिवालय के मुताबिक खाने पीने पर सब्सिडी का खर्च बढ़ता जा रहा है। आंकड़ों के मुताबिक साल 2009.10 में ये सब्सिडी 10ण्46 करोड़ थी जो 2012.13 में 12ण्52 करोड़ और एक साल बाद ये 14ण्09 करोड़ हो गई। यानी पांच साल में 60 करोड़ से ज्यादा की सब्सिडी दी गई। कहा जा रहा है कि जब सांसदों को भत्ते की शक्ल में कई तरह की सुविधाएं मिलती हैं तो जनता के पैसे से उन्हें खाने में सब्सिडी की क्या जरूरत है।
संसद की ये वही कैंटीन है जहां खुद पीएम मोदी ने खाना खाने के बाद विजिटर्स बुक में लिखा था अन्नदाता सुखी भव। सवाल ये है कि जब सांसदों की थाली में लागत से भी कम कीमत में खाना परोसा जाता रहेगा। तो अन्नदाता यानी किसान सुखी कैसे रहेगा। क्या करोड़ों की इस सब्सिडी को किसानों की मदद में नहीं लगाया जा सकता।

