जानें, क्यों 12 अक्टूबर तक रहेंगे कौओं के 'अच्छे दिन'
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27 सितंबर से श्राद्ध पक्ष शुरू हो गया है। यह 12 अक्टूबर को सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के दिन पूर्ण होगा। इस पखवाड़े में कौओं के अच्छे दिन रहने वाले हैं। लोग इन्हें पुकारेंगे और आदर सत्कार के साथ खाना परोसेंगे। जिन लोगों का यह खाना स्वीकार करेंगे वो प्रसन्न होंगे। जिनका भोजन ग्रहण कौए नहीं आएंगे वे इन्हें बुलाने के लिए अतिरिक्ति प्रयास करेंगे।श्राद्ध पक्ष मूलतः परिवार के पूर्वजों, पितरों को याद करने का पाक्षिक पर्व है। इसमें पुत्र नदी या तालाब के किनारे कुशा, तिल, जौ, अक्षत इत्यादि के साथ स्नान के बाद पितरों को अंजुलि जल अर्पण करता है। ऐसा इस पखवाड़े में नित्यप्रति किया जाता है। साथ ही पितर की निर्वाण तिथि के दिन उनका प्रिय भोजन बनवाकर सर्वप्रथम कौओं के लिए निकाला जाता है। उन्हें छत या खुली जगह पर खाना परोस कर बुलाया जाता है। पीने के लिए पानी भी रखा जाता है। तत्पश्चात ही यह भोजन ब्राह्मणों एवं अन्य पूज्यों को खिलाया जाता है।
मान्यता है कि मनुष्य योनि के बाद मृतात्मा सबसे पहले कौआ योनि में प्रवेश करती है। इसी कारण मृतक की पसंद का भोजन सबसे पहले कौओं को खिलाया जाता है। कौआ काले रंग का कबूतर के आकार का पक्षी होता है। हालांकि वह कबूतर से रंग, आकार, आवाज एवं चातुर्य में पूर्णतः भिन्न होता है। आधुनिक शोधों के अनुसार कौओं का मस्तिष्क चिप्पाजी एवं बंदर की तरह तेज होता है। कई देशां में तो इन्हें मत्स्याखेट आदि में सहायता के लिए प्रशिक्षित कियाजाता है।
कौओं की याददाश्त बहुत अच्छी होती है। वे शत्रु का चेहरा को सालों तक नहीं भूलते। इतना ही नहीं वे उस पर संगठित होकर हमला भी कर देते हैं। कौओं की सूंघने की शक्ति भी अद्वितीय होती है। अक्सर वे खाने की गंध से ही उसे पहचानते हैं। एक मनोवैज्ञानिक ने तो एक पॉलिथीन में खाद्य सामग्री कौओं के बीच रख कर इस संबंध में प्रयोग भी किया और पाया कि कौओं ने इस पॉलीथिन को छुआ भी नहीं।
कौअे संवेदनशील जीव होते हैं। ये खतरा भांपते ही या भोजन की उपस्थिति देखते ही कांव-कांव करने लगते हैं और साथियों को इकट्ठा कर लेते हैं। इस तरह एक सामाजिक प्राणी होने का परिचय भी देते हैं। भूकंप और ग्रहणकाल जैसी प्राकृतिक घटनाओं के दौरान सबसे पहले इन्हीं में हलचल देखी जाती है। इस तरह ये एक प्रकार से हमारे लिए संकेतक की भूमिका भी अदा करते हैं।
कौअे अब विलुप्ति प्रजाति में शुमार हो चुके हैं। कारण, यह मांस और तैयार भोजन पर भर निर्भर होते हैं। खाद्य सामग्रियों में अब हानिकारक रसायनों व नमक इत्यादि की मात्रा प्रयोग पूर्व की तुलना में बढ़ गया है। साथ ही वायु एवं ध्वनि प्रदूषण में स्वयं को अहसज पाते हैं।
कौओं से जुड़ी जो कहानी सबसे प्रचलित वह है-आधे भरे घड़े को कंकड़ों से भरकर पानी को उूपर लाकर पीने की। यह कहानी कौए के बौद्धिकता को देखते हुए यथार्थ जान पड़ती है। कौओं को इससे भी विषम परिस्थितियों में खाना-पानी प्राप्त करते हुए देखा जा सकता है।
घर की मुंडेर पर बैठकर कौए का कांव-कांव करना मेहमानों या लंबे समय से घर के बाहर रहने वाले सदस्य के आने का संकेत माना जाता है। इस तथ्य में बहुत हद तक सच्चाई इसलिए भी है कि जो चेहरा कौआ एक बार देख लेता है वह सालों तक नहीं भूलता है। श्राद्ध में कौए को भोजन देने की परंपरा भी संभवतः इसी गुण के कारण हुई हो। क्योंकि कौए का मुडेर पर किसी अपने के करीब होने का संकेत स्वरूप होता ।
