Exclusive : 94 बरस की शहीद की मां 14 बरस से भटक रही इंसाफ के लिये!
https://husainijnp.blogspot.com/2016/07/2002-14-94-20-2002-10-7.html
🌕2002 में बाघा बार्डर पर पाई थी शहीद अदीब अनवर ने शहादत
🌕न सरकारी रक़म ही पूरी मिली न सरकारी योजनाओं का लाभ
असगर नकी
सुल्तानपुर । अदालत से लेकर सदन फिर वहां से सत्ता पक्ष-विपक्ष और अंत में सड़कों पर एक ही शब्द की गूंज सुनने को मिलती है "इंसाफ" चाहिये, देश पर कुर्बान हुए एक सपूत की मां की भी पुकार यही है जो पिछले 14 वर्षों से लग रही है लेकिन देश भक्ति में लीन ठेकेदारों के कानों तक शायद ये सदा अब तक नहीं पहुंची, अब सवाल ये है कि जहां एक शहीद के परिवार को इंसाफ नहीं मिल पा रहा वहां एक आम-आदमी इन बहरों के सामने अपना गला क्यों फाड़ रहा है? ये बातें आज इसलिये कहीं जा रहीं के मंगलवार को कारगिल दिवस था और इन शहीदों को नमन वो चेहरे कर रहे थे जिन चेहरों को शहीद के परिवार के लोग देखना पसंद नहीं करते।
94 वर्षीय बुजुर्ग जसीमुन निसां ने अपनी कोख से जन्मे 20 बरस के बेटे "शहीद अदीब अनवर" को देश के नाम पर कुर्बान कर दिया, ये शहादत वर्ष 2002 में बाघा बार्डर पर हुई थी, जवान बेटे को खो देने के बाद भी "उम्र के इस पड़ाव पर पहुंची मां के माथे पर न शिकन है, न चेहरे पर ग़म के आसार और न ही ज़बान पर शिकवा और गिला, हां शहीद की मां के दिल में एक दर्द ज़रूर है"!
सुल्तानपुर । अदालत से लेकर सदन फिर वहां से सत्ता पक्ष-विपक्ष और अंत में सड़कों पर एक ही शब्द की गूंज सुनने को मिलती है "इंसाफ" चाहिये, देश पर कुर्बान हुए एक सपूत की मां की भी पुकार यही है जो पिछले 14 वर्षों से लग रही है लेकिन देश भक्ति में लीन ठेकेदारों के कानों तक शायद ये सदा अब तक नहीं पहुंची, अब सवाल ये है कि जहां एक शहीद के परिवार को इंसाफ नहीं मिल पा रहा वहां एक आम-आदमी इन बहरों के सामने अपना गला क्यों फाड़ रहा है? ये बातें आज इसलिये कहीं जा रहीं के मंगलवार को कारगिल दिवस था और इन शहीदों को नमन वो चेहरे कर रहे थे जिन चेहरों को शहीद के परिवार के लोग देखना पसंद नहीं करते।
94 वर्षीय बुजुर्ग जसीमुन निसां ने अपनी कोख से जन्मे 20 बरस के बेटे "शहीद अदीब अनवर" को देश के नाम पर कुर्बान कर दिया, ये शहादत वर्ष 2002 में बाघा बार्डर पर हुई थी, जवान बेटे को खो देने के बाद भी "उम्र के इस पड़ाव पर पहुंची मां के माथे पर न शिकन है, न चेहरे पर ग़म के आसार और न ही ज़बान पर शिकवा और गिला, हां शहीद की मां के दिल में एक दर्द ज़रूर है"!
वैसे उनका ये दर्द जायज़ है इसलिये कि शहादत के बाद तत्कालीन केंद्र व राज्य की सरकार ने इस मां के साथ चार सौ बीसी की वो तीर का सा ज़ख्म दे गई, उस वक़्त केंद्र द्वारा घोषणा की गई 10 लाख की रक़म में से उन्हें 7.5 लाख ही दी गई, वहीं राज्य सरकार ने शायद इसे आम आदमी की मौत समझते हुए चुप्पी ही साध ली और इस कोष से "फूटी कौड़ी" भी शहीद की मां को नहीं मिली।
गौरतलब रहे कि इतनी बात के बाद कोई ये न समझ बैठे कि शहीद की बूढ़ी मां अपने बेटे की शहादत की सौदेबाजी कर रहीं, नहीं बल्कि सेना के कमान अधिकारियों का निर्देश था जो ज़िम्मेदारो ने हवा में उड़ा दिया, सेना के कमान अधिकारियों द्वारा जारी पत्र के अनुसार (113 सैन्य अभियंता दल केयर आफ 56 एपीओ) के पत्रांक संख्या 1305/02/01 में दर्शाया गया है कि सूबे की सरकार शहीद के परिवार में मौजूद नामिनी को 10 लाख एक्स-ग्रेसिया के रूप में देगी, साथ ही साथ राज्य सरकार से मिलने वाले लाभ के बावत निदेशालय सैनिक कल्याण एवं पुनार्वास ने निर्देशित किया था कि शहीद के परिवार के "एक व्यक्ति को नौकरी या एक पेट्रोल पम्प आवंटित किया जाये, इन निर्देशों को रद्दी की टोकरी में डाल राज्य सरकार ने शहीद की शहादत के 14 बरसों में मां समेत परिवार को सिर्फ कोरे आश्वासन ही दिये हैं, हां जिस सरकार के पास शहीद के परिवार को देने के लिये कुछ नहीं है उन सरकारों ने अपने चहेतों को खुश करने के लिये जहां नौकरियाँ बांटी हैं वहीं रेवडियों की तरह वर्ग-विशेष को पम्प आवंटित किया है, ऐसे में ये कहा और लिखा तो जा ही सकता है के ये शहादत से खिलवाड़ है, जिसका जवाब अतीत के गर्भ में है।


