वैवाहिक कलह में हर बार पति ही क्यों कष्ट उठाएं?
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आम तौर पर अब तक वैवाहिक कलह के मामलों में हर बार पतियों को ही कष्ट झेलना पड़ता था लेकिन अब उन्हें इससे जुड़ी परेशानीयों से निजात मिलने वाला है |
वैवाहिक कलह के मामलों में हर बार पति ही क्यों कष्ट उठाएं? ऐसा हमारा नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट का मानना है. जी हां! पिछले कुछ वर्षों से ऐसा ही होता चला आ रहा था कि वैवाहिक कलह के मामलों में पत्नियों की अपील को कोर्ट में तवज्जो दी जाती थी |
जिसके चलते कोर्ट पत्नीयों की सहूलियत को ध्यान में रखते हुए केस ट्रांसफर की अपील को मंजूरी देता था लेकिन इससे पतियों को काफी परेशानियां उठानी पड़ती थी |
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एचएल दत्तू और जस्टिस एके सिकरी ने यह माना कि शादी से जुड़े मामलों में कोर्ट केवल पत्नियों की तरफ नरमी बरतता है | सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'हर बार ऐसे मामलों में केवल पति ही क्यों कष्ट झेले?' पीठ ने कहा कि अब से अगर केस ट्रांसफर की अपील दायर की जाती है तो केवल मंजूरी पत्नियों की सहूलियत के आधार पर नहीं होगी |
अब ऐसे मामले में याचिका की मेरिट के आधार पर फैसला किया जाएगा, चाहे अपील किसी भी पक्ष ने की हो. गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में फैसला दिया |
दरअसल इस मामले में पत्नी ने अपील की थी कि मामले को गाजियाबाद से बेतुल कोर्ट में शिफ्ट किया जाए. लेकिन कोर्ट ने पति को होने वाली संभावित परेशानियों को देखते हुए अपील खारिज कर दी |

