पीपली गांव बन गया दादरी का बिसहड़ा, दब गई अखलाक की मौत !
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नई दिल्ली। दादरी के बिसहड़ा गांव में गौमांस पर 50 साल के शख्स की हत्या ने देश के सांप्रदायिक माहौल का सच सामने ला दिया है। गांव के मंदिर से गोमांस का ऐलान होना और उन्मादी भीड़ का कातिल बन जाना, दादरी के इस गांव में कहानी अब इससे बहुत आगे बढ़ चुकी है। दादरी का मामला अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी आया है, दुनिया इसे देख रही है। हादसे के बाद नेताओं और मीडिया का जमावड़ लग गया। अखलाक की मौत का मुद्दा जैसे कहीं दब गया। नेताओं के बयानों ने ऐसी जमीन तैयार कर दी जिसमें वोटों की फसल जमकर काटी जा सके। आइए जानते हैं, नेताओं, प्रशासन, पुलिस ने इस घटना को किस मोड़ पर पहुंचा दिया-
नेताओं का पक्षः बिसहड़ा गांव की घटना के बाद संवेदना तो तार-तार हुई ही है लेकिन इसका असर बाकी इलाकों तक पहुंचाने का श्रेय भी नेताओं को ही जाता है। केंद्रीय मंत्री और गौतमबुद्धनगर सीट से बीजेपी सांसद ने सबसे पहले इसे एक 'दुर्घटना' बताया। इसके बाद तो नेताओं के बयानों का सिलसिला और गांव में उनके दौरे ऐसे शुरू हुए कि अभी तक जारी है... संगीत सोम, अरविंद केजरीवाल, राहुल गांधी, असदुद्दीन ओवैसी सब वहां पहुंचे। जो दादरी से दूर रह गए, वह कैमरे पर बात पूरी करते रहे... क्या है ये? न पीड़ा दिखाई देती है किसी को, न संवेदना नाम की चीज है। आज खबर आई कि योगी आदित्यनाथ भी वहां जाने वाले हैं।
मीडिया कवरेजः दादरी में भीड़ के कथित अपराध को मीडिया ने किस तरीके से पेश किया, इसपर चर्चा होनी जरूरी है। हत्या के बाद से ही गांव में मीडिया का भारी जमावड़ा लगने लगा था। शायद राष्ट्रीय चैनलों के लिए दादरी सुलभ रहा इसलिए ऐसा हुआ लेकिन इस आसानी ने गांव के लिए मुश्किल पैदा की। बिसहड़ा गांव प्राइम टाइम शो का न्यूजरूम बन गया, अखलाक की बिलखती मां की तस्वीर कैमरे में उतारने की होड़ सी चल पड़ी और तो और सदमें में डूबे परिवार से सवाल-जवाब नहीं रुका। शायद यही वजह था कि स्थानीय लोगों ने समाचर चैनलों की टीम पर हमला किया और उन्हें नुकसान भी पहुंचाया।
प्रशासन की कार्रवाईः दादरी के बिसहड़ा गांव में, जहां पंचायत चुनाव भी होने वाले हैं। ऐसी खबर मिली कि किसी ग्रुप ने 'प्रताप सेना' नाम का संगठन खड़ा कर रखा था। क्या यह ठीक नहीं होता अगर ऐसे संगठनों पर वक्त रहते लगाम लगाई गई होती। घटना वाली रात भी, मंदिर में ऐलान से लेकर भीड़ द्वारा पूरे काम को अंजाम देने तक इसे रोकने की किसी तरह की प्रशासनिक कोशिश दिखाई नहीं दी। अगर यह सब नहीं हुआ तो कम से कम अखलाक की मौत के बाद गांव में नेताओं को एंट्री से तो रोका ही जा सकता था।
राज्य-केंद्र का कदमः अखिलेश सरकार 'मुजफ्फरनगर दंगे' के बाद से ही अल्पसंख्यक विरोधी होने का आरोप झेल रही है। इस बार सरकार ने शुरू में तो ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाई लेकिन खबर मीडिया में छा जाने के बाद उसने तत्परता प्रदर्शित करने की जरूरत महसूस की। सीएम अखिलेश ने परिवार को लखनऊ बुलाया। पहले परिवार को 10 लाख, फिर 20 लाख और फिर राहत की राशि को बढ़ाकर 45 लाख कर दिया गया। राज्य सरकार ने राहत का ऐलान किया लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाया गया। हां, लेकिन पीड़ित परिवार और अल्पसंख्यकों को भरोसे में लेने का काम तो किया ही जा सकता था।
धार्मिक सद्भावः 14,000 की आबादी वाले बिसहड़ा गांव में करीब 50 मुस्लिम परिवार हैं। मगर, अब दहशत के कारण यहां के 8 मुस्लिम परिवारों ने गांव छोड़ दिया है और अखलाक का परिवार भी गांव में वापस लौटने को तैयार नहीं है। आखिर ऐसी क्या वजह रही कि सालों से गांव में एकसाथ रहते आ रहे दो समुदायों में भरोसा अचानक इतना कम हो गया है? एक अफवाह किसी की जान ले ले, क्या हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं? हिंदू-मुस्लिमों के बीच विश्वास बनाने के लिए राजनीतिक स्तर पर आज तक क्यों कोई सशक्त प्रयास नहीं किया गया। अखलाक अहमद के बड़े भाई जमील ने कहा कि ऊपरवाला जाने, घटना के पीछे किसका हाथ है। जो लोग हमें बचाने आए वो भी तो हिंदू ही थे ।
नेताओं का पक्षः बिसहड़ा गांव की घटना के बाद संवेदना तो तार-तार हुई ही है लेकिन इसका असर बाकी इलाकों तक पहुंचाने का श्रेय भी नेताओं को ही जाता है। केंद्रीय मंत्री और गौतमबुद्धनगर सीट से बीजेपी सांसद ने सबसे पहले इसे एक 'दुर्घटना' बताया। इसके बाद तो नेताओं के बयानों का सिलसिला और गांव में उनके दौरे ऐसे शुरू हुए कि अभी तक जारी है... संगीत सोम, अरविंद केजरीवाल, राहुल गांधी, असदुद्दीन ओवैसी सब वहां पहुंचे। जो दादरी से दूर रह गए, वह कैमरे पर बात पूरी करते रहे... क्या है ये? न पीड़ा दिखाई देती है किसी को, न संवेदना नाम की चीज है। आज खबर आई कि योगी आदित्यनाथ भी वहां जाने वाले हैं।
मीडिया कवरेजः दादरी में भीड़ के कथित अपराध को मीडिया ने किस तरीके से पेश किया, इसपर चर्चा होनी जरूरी है। हत्या के बाद से ही गांव में मीडिया का भारी जमावड़ा लगने लगा था। शायद राष्ट्रीय चैनलों के लिए दादरी सुलभ रहा इसलिए ऐसा हुआ लेकिन इस आसानी ने गांव के लिए मुश्किल पैदा की। बिसहड़ा गांव प्राइम टाइम शो का न्यूजरूम बन गया, अखलाक की बिलखती मां की तस्वीर कैमरे में उतारने की होड़ सी चल पड़ी और तो और सदमें में डूबे परिवार से सवाल-जवाब नहीं रुका। शायद यही वजह था कि स्थानीय लोगों ने समाचर चैनलों की टीम पर हमला किया और उन्हें नुकसान भी पहुंचाया।
प्रशासन की कार्रवाईः दादरी के बिसहड़ा गांव में, जहां पंचायत चुनाव भी होने वाले हैं। ऐसी खबर मिली कि किसी ग्रुप ने 'प्रताप सेना' नाम का संगठन खड़ा कर रखा था। क्या यह ठीक नहीं होता अगर ऐसे संगठनों पर वक्त रहते लगाम लगाई गई होती। घटना वाली रात भी, मंदिर में ऐलान से लेकर भीड़ द्वारा पूरे काम को अंजाम देने तक इसे रोकने की किसी तरह की प्रशासनिक कोशिश दिखाई नहीं दी। अगर यह सब नहीं हुआ तो कम से कम अखलाक की मौत के बाद गांव में नेताओं को एंट्री से तो रोका ही जा सकता था।
राज्य-केंद्र का कदमः अखिलेश सरकार 'मुजफ्फरनगर दंगे' के बाद से ही अल्पसंख्यक विरोधी होने का आरोप झेल रही है। इस बार सरकार ने शुरू में तो ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाई लेकिन खबर मीडिया में छा जाने के बाद उसने तत्परता प्रदर्शित करने की जरूरत महसूस की। सीएम अखिलेश ने परिवार को लखनऊ बुलाया। पहले परिवार को 10 लाख, फिर 20 लाख और फिर राहत की राशि को बढ़ाकर 45 लाख कर दिया गया। राज्य सरकार ने राहत का ऐलान किया लेकिन केंद्र सरकार की तरफ से ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाया गया। हां, लेकिन पीड़ित परिवार और अल्पसंख्यकों को भरोसे में लेने का काम तो किया ही जा सकता था।
धार्मिक सद्भावः 14,000 की आबादी वाले बिसहड़ा गांव में करीब 50 मुस्लिम परिवार हैं। मगर, अब दहशत के कारण यहां के 8 मुस्लिम परिवारों ने गांव छोड़ दिया है और अखलाक का परिवार भी गांव में वापस लौटने को तैयार नहीं है। आखिर ऐसी क्या वजह रही कि सालों से गांव में एकसाथ रहते आ रहे दो समुदायों में भरोसा अचानक इतना कम हो गया है? एक अफवाह किसी की जान ले ले, क्या हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं? हिंदू-मुस्लिमों के बीच विश्वास बनाने के लिए राजनीतिक स्तर पर आज तक क्यों कोई सशक्त प्रयास नहीं किया गया। अखलाक अहमद के बड़े भाई जमील ने कहा कि ऊपरवाला जाने, घटना के पीछे किसका हाथ है। जो लोग हमें बचाने आए वो भी तो हिंदू ही थे ।

