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सुख का सबसे बड़ा साधन है त्याग व निर्मयताः आत्म प्रकाश महाराज

श्रीमद्भागवत कथा में विष्णु-रूक्मणी के विवाह की झांकी रही आकर्षण का केन्द्र
जौनपुर। पूर्वांचल की शक्तिपीठ मां शीतला चौकियां धाम में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा के 8वें दिन महाराष्ट्र से पधारे स्वामी संत शिरोमणि आत्म प्रकाश जी महाराज ने कहा कि सुदामा की गरीबी जगजाहिर है। वस्त्र व अन्न भी उनके लिये कठिन था लेकिन परमात्मा से कभी कुछ मांगे नहीं। भागवत में वर्णन है कि सुदामा भगवान के परम् मित्र थे। ये सब बातें उनके जीवन आचरण में पूर्ण रूप से चमकती है। इतनी योग्यता, तपस्या, ज्ञान, भक्ति से भरे हुये महासंत महाभागवत की उपाधि से ओत-प्रोत चाहते तो उनके पास क्या न होता लेकिन उन्होंने भगवान की भक्ति व इच्छा में सब कुछ समर्पित कर भक्तों के आदर्श बनें। ऐसे भक्तों का स्वयं भगवान चरम धोयें व वंदन-पूजन किये। महाराज जी ने कहा कि बड़े-बड़े चक्रवर्ती राजा जिन भगवान के चरणों में अपना मुकुट झुकाते थे, वही भगवान मित्र सुदामा को अपने सिंहासन पर बैठाये और उनको देवराज इन्द्र से भी ज्यादा वैभव प्रदान किये। भगवान से निष्काम प्रेम करने वाला लोक-परलोक दोनों का सुख प्राप्त करता है। इन महाभागवतों से भरी भागवत कथा सुनने से जन्मों के पाप से मुक्त होकर जीव लोक-परलोक के सुख का अधिकारी होता है। भागवत के समापन पर मुख्य आकर्षण का केन्द्र रही भगवान विष्णु व रूक्मणी के विवाह की झांकी। इस अवसर पर प्रवीण पण्डा, राजकुमार गुप्ता, विनोद गुप्ता, सचिन, विनय, आकाश, अनिल साहू, दीपक राय, संजय गुप्ता, राजेश गुप्त, विनोद मोदनवाल सहित हजारों नर, नारी, बच्चे, बूढ़े, युवा के अलावा अन्य उपस्थित रहे।

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