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ठण्ड के कारण बच्चे समय से नही पहुंच पा रहे स्कूल

अजमी रिज़वी
बाराबंकी। भीषण कोहरे की चादर ने सम्पूर्ण वातावरण को अपने आगोश में ले लिया जिससे आम जन जीवन काफी अस्त-व्यस्त हो गया लोग गर्म लिहाफों और ऊनी वस्त्रांे में दुबकने को मजबूर हो गये। विगत कई दिनों से क्षेत्र में पड़ रहे भीषण कोहरे से जहां ठण्ड़क में इजाफा हुआ है। वहीं आम जन जीवन काफी अस्त-व्यस्त हो गया लोगों ने ऊनी गर्म कपड़ों और लिहाफों का इस ठण्ड़क से बचने के लिए सहारा लिया। क्षेत्र के प्राइमरी से लेकर इण्टरमीडिएट तक की शिक्षण संस्थायें 8ः50 बजे से संचालित हो रही हैं। भीषण कोहरे और ठण्ड़क के कारण छोटे-छोटे मासूस बच्चे समय से स्कूल नही पहुंच पा रहे हैं। जिसके सम्बन्ध में जब उनके अभिभावको से बात की गयी तो उन्होने बताया कि कोहरे के कारण नौनिहाल बच्चों का जीवन भी काफी अस्त-व्यस्त हो गया है। उन्हे सुबह समय से ताजा भोजन भी नही मिल पाता है। जिसका आलम यह है कि वे अपने घरों से भूखे पेट ही पढ़ने के लिए निकल जाते हैं। यदि विद्यालयों का समय प्रातः 9ः30 बजे से 3ः30 बजे तक कर दिया जाये तो उन्हे थोड़ा सहूलियत मिल जाये। साथ ही साथ अभिभावकों ने बताया कि उन्हे यह भी भय लगा रहता है कि कोहरे के कारण उनके बच्चे पता नही कब दुर्घटना ग्रस्त हो जायें । मौसम के पलटने से सबसे ज्यादा परेशानी तो मजदूरी पेशा करके जीवन यापन करने वाले मजदूरों को होती है। किसी दिन तो उनकी मजदूरी लगती है और किसी दिन नही भी लगती है। तो उनके घरों में चूल्हा जलने की नौबत भी नही आती है। मजदूरी का कार्य करके जीवन यापन करने वाले एक मजदूर ग्राम टिकुरी निवासी गुरूदीन ने बताया की जब मजदूरी नही लगती है। तो ये ”पापी पेट” नही मानता है। बच्चों का पेट भरने के लिए कोई न कोई व्यवस्था अलग से करनी पड़ती है। जरूरत मंद लोगों से पैसा एडवांस लेकर अपने बच्चों का भरण पोषण करते हैं। तो वहीं रिक्शा चालक श्रीकेशन ने बताया कि जाड़े में रिक्शा चलाने में बहुत मेहनत पड़ती है। कोहरे के कारण जान जोखिम में डालकर रिक्शा चलाना पड़ता है। कि पता नही कब कोई वाहन आ जाये और दुर्घटना का शिकर हो जायें गर्मी की अपेक्षा जाड़े के मौेसम में सवारियां भी कम निकल पाती हैं। फिर भी परिवार को चलाने के लिए सवारियों के इन्तिजार में घण्टों फुटपाथ पर खड़े रहना पड़ता है। तो वहीं पशु पालकों ने बताया कि ठण्डक के कारण उनके पालतू पशु गर्मी की अपेक्षा जाड़े के मौसम में चारा भी कम खाते हैं । अब  तो यही कहावत भैय्या चरितार्थ हो रही है। ”ठण्डक का जोर इतना, न चरै गैय्या न उड़ै चिरैयृया” ।। तो वहीं किसानों ने बताया कि कोहरे का असर जिन सरसों के खेतों में फूल आ गये हैं। उनमें काफी नुकसान हो रहा है। कोहरे के पानी का जब पुष्पों के दलों में ठहराव हो जाता है। तो सरसों की छोटी-छोटी कलियां सड़ कर नीचे की ओर जमीन में गिर जाती हैं। तो वहीं सरसों के पौधों में माहू नामक कीट रोग लगने की प्रबल सम्भावना व्यक्त की जा रही है। लेकिन भाई क्या किया जाये । ईश्वर को जो मंजूर होता है। वही होता है।

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