हजरत मलामत शाह बाबा ने दिया कौमी एकता का संदेश
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अजमी रिज़वी
बाराबंकी। जनपद बाराबंकी की पवित्र माटी से समय-समय पर अनेकों सूफी सन्तों व सिद्ध महात्माओं ने सम्पूर्ण मानव जाति को कौमी एकता का संदेश दिया। आज से करीब साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व देेेश में सबसे क्रूरतम व अत्याचारी औरंगजेब का शासन था। समाज में छुआ छूत, भेद-भाव, सती प्रथा, बाल विवाह तथा ऊंच-नीच की भावना व अन्य सामाजिक कर्मकाण्डों का प्रचलन अपनी चरम सीमा पर था। ऐसी विषम परिस्थितियों में जो रब है-वही राम है, का संदेश देने वाले अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सूफी सन्त देवां के हाजी वारिस अली शाह, हेतमापुर के बाबा नरायन दास, कोटवाधाम के सतनामी सम्प्रदाय के संस्थापक समर्थ सांई जगजीवन साहेब, बदोसरायं के समीप टिकुरी (तकिया) हजरत मलामत शाह बाबा ने समस्त मानव जीवन को कौमी एकता का संदेश दिया। जनचर्चा के मुताबिक ईरान से हजरत मलामत शाह बाबा शेर पर सवार होकर समर्थ सांई जगजीवन साहेब की तपोस्थली कोटवाधाम आये तत्पश्चात् वे जब लौट करके कस्बा बदोसरायं पहुंचे लोगों से पूछा कि यह कौन सा गांव है, लोगों ने बताया बदोसरायं मलामत शाह बाबा ने कहा जहां ”बद” वहां मलामत वे वहीं पर ठहर गये जहां की आबो हवा उनको इतनी अच्छी लगी कि वे वहीं के होकर रह गये। जब गांव के लोग सो जाते थे। तो हजरत मलामत शाह बाबा जोरों के साथ हक् अल्ला हक् अल्ला की सदा बुलन्द करते थे। जिससे लोगों की नींद में व्यवधान उत्पन्न होता था। लोगों ने इनको मारने की योजना बनायी जब इनको मारने के लिए गये तो इनके हाथ-पैर व धड़ अलग थलग पड़े हुए मिले। लोगों ने समझा कि किसी ने इनकी हत्या कर दिया। दूसरे दिन फिर जब सभी लोग सो गये तो वही हक् अल्ला- हक् अल्ला की सदा सुनाई दी लोग पुनः जब इनको देखने के लिए गये तो इनके अंग उसी प्रकार से कटे हुए जहां तहां पड़े मिले । लोग समझ गये कि ये कोई मामूली शख्स नही हैं। बल्कि जरूर कोई सूफी सन्त है। लोगों ने अपनी इस सोंच के लिए माफी मांगी और इनके मुरीद हो गये। जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी. पूरब रामनगर टिकैतनगर रोड पर कस्बा बदोसरायं में सूफी सन्त हजरत मलामत शाह रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह स्थित है जहां पर देश के कोने-कोने से जायरीन इनके सालान उर्स 8 रविउलअव्वल को पहुंच कर जियारत करके मिन्नतें मांगते हैं। लोगों के द्वारा सच्चे दिल से इनकी दरगाह पर मांगी गयी मुरादें अवश्य पूरी होती हैं। ऐसा लोगों का विश्वास है। एक दशक पूर्व कहा जाता है। कि कुल वाली रात्रि 8 रविउलअव्वल को जंगल का राजा शेर इनकी दरगाह पर पूंछ से झाडू लगाकर सफाई करने आ जाता था। तो वहीं मजार के मुजाबिरों द्वारा पुकारे जाने पर झुण्डोे में शियार शीरीनी खाने के लिए आ जाते थे। धीरे-धीरे वक्त के थपेड़ों के साथ ही साथ उक्त जंगली प्रजातियां विलुप्त हो गयी। इन्होने जीवन में अनेकों चमत्कार दिखाये कहा जाता है कि मलामत शाह के आवागमन के समय घाघरा नदी बदोसरायं के काफी करीब से बहा कर उथल पुथल मचा कर लोगों को परेशान करती थीै इन्होने नदी से कहा तुम यहां से बहुत दूर निकल जाओं नही तो तुम्हे बहुत मार पड़ेगी। नदी घाघरा की धारा धीरे-धीरे उक्त स्थान को छोड़ कर करीब 5 किमी दूर सीमित हो गयी। मलामत शाह बाबा की दरगाह के सालाना उर्स में हिन्दू-मुस्लिम दोनो धर्मो के लोग पहुंच कर अपने मुकद्दर को संवारते हैं। इन्होने जीवन पर्यन्त लोगों को मेल मोहब्बत का पैगाम दिया।

