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अपनी ज़बान की इज्ज़त करो ताकि ज़बान की आबरू बची रहे: मौलाना वसी

अजमी रिज़वी

बाराबंकी। पांच दिवसीय मजलिस की आखरी मजलिस को खिताब करते हुए हाजी रईस के अजाखाने में प्रोफेसर वसी का अरबी कालेज फैजाबाद मौ0 वसी हसन खंा ने कहा अपनी जबांन की इज्जत करो उसे अदब का आदी बनाओं ताकि जबान की आबरू बची रहे। अक्ल वह है जो फायदा उठाती है जबान वह है जिससे फायदा पहुचाया जाता है। सही अक्ल वह है जिससे रहमान की इबादत हो; और जन्नत हासिल हो। इसके अलावा अक्ल के नाम शैतनियत होती है। ’’अक्लमंद आदमी वह है जो अपनी जबान को गीबत से बचा कर रखता है। मौलाना ने यह भी पढ़ा- पहले तकवा एख्तियार करो फिर सच्चो के साथ हो जाओं। अन्त में आबिदे बिमार जनाबे जैनब के दर्दनाक मसायब पेश किये जिसे सुनकर अजादार जारोंकतार रोने लगे। मजलिस से पूर्व सईद जैदपुरी उनके हमनवा ने सोजख्वानी मर्सियाख्वानी पेश करते हुए पढ़ा- यकीन है; यही है नजात की जामिन; अजाएंशह में नीयत अगर खराब नही। मासिवा अहमद के यू मेराज पा सकता है कौन पेशे रब पहने हुए नालैन जा सकता है कौन इसके बाद नजरानये  अकीदत का सिलसिला शुरू किया जिसमें करनैलगंज गोण्डा से आये शायरे अहलेबैत मुजीब सिद्दीकी ने पढ़ा- बादे रसूल दीं की हिफाजत के वास्ते; अल्लाह की तरफ से ये सामान हो गया। मौलाये कायनात तो; मौला अजल से थे; बस यह हुआ वदीर में ऐलान हो गया। गुनाह कहते थे मेेरे फिसार हो इसको तुराब कहती थी हुक्मे अबूतुराब नही। कशिश सण्डीलवी ने पढ़ा- तेरे करम का तो मौला कोई हिसाब नही जहां मे कोई मिसाले अबूतुराब नही मुजफ्फर इमाम ने पढ़ा-दुवांए बस वही होती है मुस्तजाब नही; वो जिसको बाबे हवायज से इन्तेसाब नही। सरवर अली रिजवी ने पढ़ा- कलामे हक के मुकाबिल कोई किताब नही; हुसैन का भी जाहं में कोई जवाब नही। हसन मेहदी ने पढ़ा- मासूमए कौनैन ने फरजन्त कहा है ये वाकया तारीखं में मुबहम तो नही है। आजिज बाखुदा हजते अब्बास का किरतार; मासूम के किरदार से कुछ कम तो नही है। मो0 अब्बास ने पढ़ा- चले जो शाम से आबिद ये काम करके चले; शबा से कब्रे सकीना के नाम कर के चले। अन्जुमन गुन्चये अब्बासिया ने नौहाख्वानी सीनाजनी की। अन्त में हाजी रईस ने सभी का शुक्रिया अदा किया।

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