तेल के दाम, चीन की घटती विकास दर, इकॉनोमी पंक्चर
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अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में लगातार गिरावट और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इकॉनोमी की घटती विकास दर ने दुनियाभर के देशों की विकास की नैया में छेद कर दिए हैं। इसकी नतीजा तेल उत्पादक देश और चीन तो भुगत ही रहे हैं, अन्य विकसित और विकासशील देशों के बाजारों में भी निराशा का माहौल बनने लगा है।
तेल की घटती कीमतों से हो रहे नुकसान से उबरने के लिए ओपेक देशों को अपनी इंटरनेशनल अस्टेट्स बेचने की नौबत आ गई है। जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट के अनुसार ये देश स्टॉक्स और बॉन्ड के रूप में 16,23,992 करोड़ (240 अरब डॉलर) की संपत्ति बेचकर राशि जुटा सकते हैं। वहीं अमरीकी बैंक के अनुसार तेल की घटती कीमतों के कारण तेल उत्पादक देशों को 260 बिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है।
इसी तरह चीन की विकास दर 25 वर्षों के निचले स्तर पर है। चीन के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार इस देश की विकास दर (जीडीपी) 6.9 प्रतिशत है, जो 1990 के बाद न्यूनतम है। वर्ष 1990 में चीन के थ्येन चौक पर हुए नरसंहार के बाद वैश्विक राजनीति में अलग-थलग पड़े चीन की विकास दर गिरकर 3.8 प्रतिशत रह गई थी।
चीन ने वर्ष 2015 के लिए 7 प्रतिशत की दर का अनुमान लगाया था, लेकिन चीन के नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टेटिक्स के मुताबिक आखिरी तिमाही में देश की विकास दर 6.8 प्रतिशत पर ठहर गई। इससे वैश्विक समुदाय में चिंता बन गई कि कहीं फिर से आर्थिक मंदी का दौर न आ जाए।
तेल की घटती कीमतों से हो रहे नुकसान से उबरने के लिए ओपेक देशों को अपनी इंटरनेशनल अस्टेट्स बेचने की नौबत आ गई है। जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट के अनुसार ये देश स्टॉक्स और बॉन्ड के रूप में 16,23,992 करोड़ (240 अरब डॉलर) की संपत्ति बेचकर राशि जुटा सकते हैं। वहीं अमरीकी बैंक के अनुसार तेल की घटती कीमतों के कारण तेल उत्पादक देशों को 260 बिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है।
इसी तरह चीन की विकास दर 25 वर्षों के निचले स्तर पर है। चीन के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार इस देश की विकास दर (जीडीपी) 6.9 प्रतिशत है, जो 1990 के बाद न्यूनतम है। वर्ष 1990 में चीन के थ्येन चौक पर हुए नरसंहार के बाद वैश्विक राजनीति में अलग-थलग पड़े चीन की विकास दर गिरकर 3.8 प्रतिशत रह गई थी।
चीन ने वर्ष 2015 के लिए 7 प्रतिशत की दर का अनुमान लगाया था, लेकिन चीन के नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टेटिक्स के मुताबिक आखिरी तिमाही में देश की विकास दर 6.8 प्रतिशत पर ठहर गई। इससे वैश्विक समुदाय में चिंता बन गई कि कहीं फिर से आर्थिक मंदी का दौर न आ जाए।

