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बराबरी और प्रेम का साथ कबीर में निहित: शाही


अजमी रिज़वी
बाराबंकी। बराबरी और प्रेम, दो तत्वों पर कबीर की कविता बल देती है, यही दोनो भाव इस्लाम से निकटता स्थापित करते हैं। उक्त विचार जवाहरलाल नेहरू स्मारक परास्नातक महाविद्यालय स्थित जेपीएन सिंह सभागार में आयोजित कबीर की कविताओं मे इस्लामिक सदर्न्भ विषयक गोष्ठी में मुख्य अतिथि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी के प्रो. सदानन्द शाही ने व्यक्त किये। डा. शाही ने यह भी कहा कि कबीर एक ऐसे समाज की संकल्पना कर रहे थे जहंा कोई पडोसी भूखा न सोये और मजदूर की मजदूरी पसीना सूखने से पहले मिल जाये। काश विकास की अवधारणा ऐसी हो जहां कबीर की संकल्पनाओं को जगह मिले। गोष्ठी के विशिष्ट अतिथि साहित्यकार शकील सिद्दीकी ने कहा कि हिन्दू मानते हैं कि कबीर हिन्दू थे और मुसलमान मानते हैं कि कबीर मुसलमान थे किन्तु कबीर खुद को न तो हिन्दू मानते थे, न मुसलमान वह सिर्फ इन्सान थे। अध्यक्षता करते हुए हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डा. भगवान वत्स ने कबीर को सामाजिक न्याय का प्रबल पक्षधर बताते हुए कहा कि मानवता की राह मे जो बाह्याचरण, आडम्बर बाधक बन लोगों को भटकाव मे ले जा रहे थे, उन सबको कड़ी फटकार कबीर की पहचान है। गोष्ठी के संयोजक डा. राजेश मल्ल, डा. राही मासूम रजा साहित्य अकादमी के डा. राम किशोर, जनेस्मा के प्राचार्य डा. अजय कुमार राय ने भी संबोधित किया। संगोष्ठी में डा. अनिता सिंह, डा. नीलम सिंह, डा. विजय प्रताप मल्ल, डा. कृष्ण कान्त, डा. अनिल कुमार, डा. पीजे पान्डेय, डा. छत्रसाल सिंह डा. जगन्नाथ सिंह आदि विशेष रूप से उपस्थित रहे।

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