सूखी टोटियां, खराब हैण्डपम्प, दर-दर भटकें तीमारदार
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अजमी रिज़वी / मनीष सिंह
बाराबंकी। मरीज का इलाज भले ही सरकार निःशुल्क कराने के लिये सरकारी
अस्पतालों में विशेष सुविधाएं मुहैया करा रही हो, लेकिन जिला महिला
चिकित्सालय में मरीजों के तीमारदार अपनी जिंदगी बचाने के लिये तमाम
प्रकार की असुविधाओं का रोज सामना करते हैं। खास बात यह है कि जहां
मरीजों की सही सुनवाई नही होती वहां तीमारदारों की बात करना अपने आप में
एक बेवकूफी ही होगी। महिला चिकित्सालय का हाल वैसे तो पर्दानशीं हैं।
लेकिन जब पानी सर से ऊपर हो जाये, तो पर्दानशीं को बेपर्दा करना
खबरनवीसों का कर्तव्य हो जाता है। आज जो हाल ‘‘अवधनामा‘‘ के संवाददाता ने
सरकारी महिला अस्पताल में देखा, जो कैमरे में कैद किया, वह हकीकत को बयां
करने के लिये काफी है।
बचपन से लोगों के मंुह से कहावत सुनते आये, टीवी पर और तमाम होर्ल्डिग्स
में प्रचार देखते आये कि जल ही जीवन है। वह कहावत आज इस अस्पताल में सूखी
टोटियों, हैण्डपम्पों और वाटर कूलर में सूखती नजर आयी। तस्वीरें हकीकत को
बयां कर रही हैं, कि कहावत और सच्चाई दोनो अलग हैं। शुरुआत करते हैं
महिला चिकित्सालय के सबसे बाहरी भाग से। चिकित्सालय के बाहर एक शीतल और
सामान्य पेयजल के लिये बाकायदा दो अलग-अलग टोटियां लगी हैं लेकिन जनाब उन
टोटियों को काफी अरसे से खुद में दो बूंद पानी भी मुहैया नही हो पाया है।
इसके बाद परिसर के बाहरी क्षेत्र में रैन बसेरा के निकट एक हैण्डपम्प लगा
है। प्यास कुछ ज्यादा ही लगी थी।
सांेचा कि चलो इसी से कुछ प्यास बुझा
लें। बगल के खड़े भाई साहब से कहा जरा हैण्डपम्प चलाईये तो दो घूंट पानी
पी लिया जाये। मित्र ने भी बड़ी तन्मयता से हैण्ड पम्प के हत्थे पर पूरा
जोऱ लगाया। एक बार नही कई बार लगाया लेकिन क्या मजाल कि एक भी बूंद पानी
की हैण्डपम्प के मुहाने से टपक भर जाती। पास खड़े तीमारदार से पूछा कहीं
और पानी पीने का इंतजाम है। तीमारदार ने बड़ी ही बेरुखी से जवाब दिया जाओ
अंदर वाला भी नल ओंट लो। शायद हुवैं पानी निकरि आवै। तीमारदार के कहने पर
प्यास की मजबूरी महिला अस्पताल के अंदर खींच ले गयी। गेट के बगल बायें
हाथ देखा तो वाटर कूलर रखा हुआ था। सोंचा अब शायद मंजिल मिल गयी लेकिन
दुर्भाग्य ने वहां भी साथ नही छोड़ा। सूखा वाटर कूलर पहले ही अपनी दुर्दशा
पर आंसू बहा रहा था। उसे छूने से पहले ही मन में कई ख्यालात पैदा हो गये
कि अगर टोंटी चार बार हिलायी तो ऐसा न हो कि यह टोंटी ही हाथ में आ जाये।
दस कदम अंदर और गये। मैटरनिटी वार्ड, इमरजेन्सी वार्ड, सर्जिकल वार्ड,
आपरेशन थिएटर इन चारों के बीच खुले मैदान में एक सरकारी हैण्डपम्प और
दिखा। देखकर लगा कि सफर अब खत्म हुआ। लेकिन हैण्डपम्प का हत्था चलाने पर
एहसास हो गया कि पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त। ठीक हैण्डपम्प के पीछे
की ओर एक दीवार पर लिखा था शुद्ध शीतल पेयजल। ठीक बगल में एक वाशबेसिन और
एक टोंटी लगी हुई थी। टोंटी घुमाई। पतली सी पानी की एक धार भी गिरी लेकिन
जैसे वाशबेसिन में नजर गयी सारी प्यास एक पल में मिट गयी। गंदगी इस कदर
कि अगर पानी पीने के लिये मुंह खोले तो उल्टी होनी तय थी और रही पानी की
शीतलता की तो उसकी तुलना गरमागरम चाय से करनी गलत नही होगी। प्यास लिये
इधर से उधर भटकते रहे। लेकिन दो बूंद पानी की मय्ास्सर न हो सकी। अब जाकर
एहसास हुआ कि अगर मात्र बीस मिनट के लिये महिला अस्पताल में एक सक्षम
आदमी का यह हाल होता है तो सोचना बड़ा आसान है कि मरीजों के साथ जो
तीमारदार हफ्ते-हफ्ते भर अस्पताल में रुकते हैं उनका हाल क्या होता होगा।
बिना पानी रोज सैकड़ों तीमारदारों को हलकान होना पड़ता है। लेकिन इनकी सुध
लेने वाला कोई नहीं है। अस्पताल के सक्षम अधिकारी स्वयं इस बात के जानकार
हैं कि मरीजों एवं तीमारदारों को सुविधा मुहैया हो। लेकिन कदम उठाना
लाजमी कोई नहीं समझता।
जल्द दुरुस्त होगी आपूर्ति: सीएमएस
बाराबंकी। अस्पताल परिसर के अंदर शुद्ध पेयजल की आपूर्ति की जा रही है
निमार्णाधीन इमारत के आसपास पहले से संचालित वाटर सप्लाई निमार्ण के कारण
अवरुद्ध है। इण्डिया मार्का हैण्डपम्प के खराब होने की जानकारी मिली है
जल्द ही जल आपूर्ति के सारे साधन दुरुस्त करा दिये जायेंगे। फिलहाल
मरीजों व तीमारदारों को पेयजल मुहैया कराया जा रहा है।
