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महंगाई डायन की मार, मुफलिसी में टूट रही आशियाना सजाने की उम्मीदें

अजमी रिज़वी
 बाराबंकी। लगातार बढ रही महंगाई के चलते गृह निर्माण सामग्री
के दाम आसमान छूनेे लगे है जहां पहले तीन-चार वर्ष पूर्व ईट 2 हजार रूपये
में एक हजार ईटे मिल जाती थी वही अब एक हजार्र इंट 6 से 7 हजार रूपये की
कीमत में मिल रही है 200 रूपये प्रति बोरी मिलने वाली सीमेंट अब 320
रूपये में मिल रही है। वही 10 रूपये वर्ग फुट मिलने वाली मौरंग अब 35
रूपये वर्ग फुट में, 4 रूपये वर्ग फुट मिलने वाली बालू अब 12 रू. में मिल
रही है । यही नही लोहे के दाम भी आसमान छूने लगे है मजदूरी भी वर्षाे में
60 रू. से बढकर 2 सौ रूपये व राजगीर की 100 रूपये से बढकर 400 सौ रूपये
पहुंच गई है। मात्र चार वर्षाे में बढी कीमतो ने आम लोगो की कमर तोड कर
रख दी है उन्हे अब सिर छुपाने के लिए आशियाना बनाना एक सपना सा लगने लगा
है। यही नही शासन द्वारा गरीबों को सिर छिपाने के लिए दिये जा रहे
इन्दिरा आवासो की जो लागत प्रति लाभार्थी को दी जा रही है वह भी इन्दिरा
आवास के निर्माण के लिए काफी कम है। कम पैसो के चलते ज्यादातर इन्दिरा
आवास अधूरे ही रह जाते है। या फिर दीवालो को खडी करके लाभार्थी उन पर
छप्पर डालकर काम चलाते है। मानक के मुताबिक एक इन्दिरा आवास में 20/10
फिट का एक कमरा व उसी में सदा शौचालय का निर्माण कराया जाना चाहिए इसके
निर्माण के लिए शासन पहले 45 हजार रूपये प्रति लाभार्थी को दिया जाता था
लेकिन अब 70 हजार रूपये दिये जाते है। जबकि 20/10 के एक पक्के कमरे के
निर्माण में लगभग 9 हजार ईटे जिसकी कीमत 54 हजार रूपये, 40 बोरी सीमेंट
की कीमत लगभग 13 हजार रूपये, बालू 300 फिट जिसकी कीमत 45 सौ रूपये,
गिट्टी लगभग 100 फुट कीमत 5500 रूपये, मौरंग 150 फिट कीमत लगभग 6 हजार
रूपये, राजगीर व मजदूर की मजदूरी लगभग 20 हजार रूपये, दरवाजे आदि 8 हजार
रूपये, सरिया 1 कुन्टल लगभग 5 हजार रूपयें, कुल मिलाकर एक इंदिरा आवास
बनाने में लगने वाली कीमत लगभग 1लााख 20 हजार रूपये का खर्च आता है
परन्तु शासन द्वारा मात्र 70 हजार रूपये दिये जाने से गरीब का आशियाना
मिलने का ख्वाब अधूरा ही रह जाता है। इस सबे बाद सोचनीय तथ्य तो यह है कि
बेचारा गरीब अपना आशियाना कैसे बनायेगा। सरकार के लाख कोशिसो के बाद भी
गरीब तबके के लोग कच्चे घरो में निवास कर रहे है आम आदमी तो इस बढती
महंगाई में मकान निर्माण सामग्री का भाव सुनकर कर ही मकान निर्माण की आशा
छोड देता है और उसका अपना मकान होने का सपना अधूरा ही रह जाता है।

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