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विभागीय अधिकारी बेखबर

बाराबंकी। शिक्षा के क्षेत्र में एक ओर सरकार जिले भर में साक्षरता पर
भारी राशि झोंक रही है वहीं स्कूल चले हम जैसे अभियान चलाकर बच्चों और
उनके अभिभावकों को पढ़ाई-लिखाई के लिये प्रेरित किया जा रहा है, वहीं आज
भी ऐसे सैकड़ों बच्चे हैं जिन्हें स्कूल में प्रवेश लेकर पढ़ाई करने की जगह
मेहनत मजदूरी कर अपने परिवार के भरण पोषण की जद्दोजहद करनी पड़ रही है।
शहर में ऐसे तमाम मासूम बच्चे हैं, जो पढ़ने की उम्र में अपनी रोजी-रोटी
कमाने और पेट भरने के लिये दर-दर भटकने पर मजबूर हैं। अनेक बच्चे तो
होटलों में गंदे बर्तन मांज-धो रहे हैं अथवा फिर चाय की दुकानों पर
बालश्रमिक के रूप में उनका बचपन बीत रहा है। कुछ मजबूर और बेबस बच्चे
लोगों से भीख मांगते देखे जाते हैं।
मजबूरी सब कुछ कराती है:- दर-दर की ठोंकर खाकर गुजर-बसर कर रहे इन बच्चों
के बुझे चेहरों पर वक्त की मार के निशान साफ पढ़े जा सकते हैं। ऐसे कई
बच्चे शहर के विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर काम और मजदूरी अथवा भीख की आस
में मंडराते दिखाई देते हैं। बस स्टैण्ड, चिकित्सालय, स्कूल, कॉलेज,
मंदिर-मजिस्द आदि जगहों पर मासूम बच्चे अपने परिजनों के साथ रोटी के लिए
भीख की प्रतीक्षा करता देखा जा सकता है। कुछ बच्चे तो मदारी का खेल और
करतब दिखलाकर लोगों का मनोरंजन करते नजर आते हैं। पीठ पर थैला लटकाये
अथवा हाथ में बड़ा से पॉलीथिन बैग रखे छोटे-छोटे बच्चे कचरे के ढेरों से
कबाड़ बीनते भी नजर आते हैं।
’सेवा का पीटते हैं ढिंढोरा’:- शहर में रोजाना इन बच्चों को मेहनत मजदूरी
करते अथवा मांगते-खाते देखा जा सकता है। समाजसेवी संस्थाएं यूं तो अपनी
समाजसेवा का आए दिन ढिंढोरा पीटती रहती हैं लेकिन इस ओर उनके कोई सार्थक
प्रयास नहीं देखे गये हैं। अनेक एनजीओ बच्चों के कल्याण के नाम पर सरकार
से अच्छा खासा अनुदान प्राप्त करते हैं और उसे हड़प जाते हैं। इन बच्चों
की किसी समाजसेवी संस्था ने आज तक कभी सुध नही ली। कई बच्चे ऐसे भी हैं
जिनके अभिभावक आर्थिक रूप से उतने कमजोर नही है किन्तु कुसंग के चलते
उन्हें नशीले पदार्थाे की लत लग चुकी है। जानकारों के अनुसार कम उम्र में
नशे के आदी हो चुके बच्चों में शारीरिक कमजोरी की शुरूआत हो जाती है
जिससे वे असमय ही दम तोड़ देते हैं।
’कानून है पर कार्रवाई नहीं’:- राज्य सरकार और श्रम पदाधिकारी द्वारा आए
दिन बालश्रम पर कड़ाई से पाबंदी के बयान जारी किये जाते हैं, जबकि हकीकतन
स्थिति ठीक विपरीत है। छोटे-छोटे बच्चों को शहर की तमाम दुकानों पर मजदूर
के रूप में काम करते देखा जा सकता है। इसे रोकने की न तो प्रशासन को
फुर्सत है और न ही र्शम कानूनों की निगरानी करने वाले विभाग को ही कोई
परवाह है, और तो और कई बच्चे लोगों के घरों में, यहां तक कि अधिकारियों
के घरों तक हाड़तोड़ मेहनत करते देखे जा सकते हैं। कुल मिलाकर बच्चों का
शोषण किये जाने के हालात बने हुए हैं, किन्तु सरकार अथवा प्रशासन इसे
रोकने के लिये कोई कार्रवाई न करते हुये उदासीन रवैया अपनाये हुये है।

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