बाबरी मस्जिद की पैरोकारी करने वाले हाशिम अंसारी का निधन
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अयोधया । राम की नगरी में रहकर राम जन्म भूमि पे सजदे की तम्मना रखने वाले हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक हाशिम अंसारी साहब आज हमारे बीच नहीं रहे ,उनके इंतेक़ाल की खबर पर क्या हिन्दू क्या मुसलमान समेत साधु संत महात्मा,और कई मौलाना उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे
हाशिम अंसारी साहब से
*रिज़वान मुस्तफ़ा*की आखिरी मुलाक़ात की
यादगार गुफ्तुगू
*रिज़वान मुस्तफ़ा*की आखिरी मुलाक़ात की
यादगार गुफ्तुगू
*"मैं फ़ैसले का भी इंतज़ार कर रहा हूँ और मौत का भी….लेकिन यह चाहता हूँ मौत से पहले फ़ैसला देख लूँ." ये शब्द हैं बुज़ुर्ग हाशिम अंसारी के, जो मेरे कानों में बराबर गूंज रहे हैं.*
पैसठ साल से बाबरी मस्जिद की क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे 95 वर्षीय हाशिम गज़ब के आदमी थे. लेकिन उनके चेहरे पर झुर्रियों के साथ-साथ ऐसी मायूसी मैंने बीस वर्षों में पहली बार देखी थी
कारण पूछने पर वो कहते हैं, "कुछ मायूसी है हालात को देखते हुए. जो मुखालिफ़ पार्टियां चैलेंज कर रही हैं, उससे मायूसी है और हुकूमत कोई एक्शन नहीं लेती."
हाशिम अयोध्या के उन कुछ चुनिंदा बचे हुए लोगों में से थे जो लगातार 65 वर्षों तक अपने धर्म और बाबरी मस्जिद के लिए संविधान और क़ानून के दायरे में रहते हुए अदालती लड़ाई लड़ रहे थे
स्थानीय हिंदू साधु-संतों से उनके रिश्ते कभी ख़राब नहीं हुए. मै जब भी उनके घर गया, हमेशा अड़ोस पड़ोस के हिंदू युवक चचा-चचा कहते हुए उनसे बतियाते हुए मिले.
हाशिम साहब कहते हैं, "मैं सन 49 से मुक़दमे कि पैरवी कर रहा हूँ, लेकिन आज तक किसी हिंदू ने हमको एक लफ़्ज़ ग़लत नहीं कहा. हमारा उनसे भाईचारा है. वो हमको दावत देते हैं. मै उनके यहाँ सपरिवार दावत खाने जाता हूँ."
विवादित स्थल के दूसरे प्रमुख दावेदारों में निर्मोही अखाड़ा के राम केवल दास और दिगंबर अखाड़ा के राम चंद्र परमहंस से हाशिम की अंत तक गहरी दोस्ती रही.
परमहंस और हाशिम तो अक्सर एक ही रिक्शे या कार में बैठकर मुक़दमे की पैरवी के लिए अदालत जाते थे और साथ ही चाय-नाश्ता करते थे.
उनके ये दोनों दोस्त भी अब जीवित नहीं रहे. मुक़दमे के एक और वादी भगवान सिंह विशारद भी नहीं रहे.
हाशिम के समकालीन लोगों में निर्मोही अखाड़ा की ओर से मुक़दमे के मुख्य पैरोकार महंत भास्कर दास जीवित हैं.
हाशिम का परिवार कई पीढ़ियों से अयोध्या में रह रहा है
हाशिम इसी संस्कृति में पले बढे़ *जहां मुहर्रम के जुलूस पर हिंदू फूल बरसाते हैं और नवरात्रि के जुलूस पर मुसलमान फूलों की बारिश करते हैं*
हाशिम 2009 हज के लिए मक्का गए थे तो कई जगह उन्हें भाषण देने के लिए बुलाया गया. हाशिम ने वहाँ लोगों को बताया कि हिंदुस्तान में मुसलमानों को कितनी आज़ादी है और वे कई मुस्लिम मुल्कों से बेहतर हैं.
हाशिम का परिवार कई पीढ़ियों से अयोध्या में रह रहा है. वो 1921 में पैदा हुए, 11 साल की उम्र में सन् 1932 में उनके पिता का देहांत हो गया.
दर्जा दो तक पढाई की. फिर सिलाई यानी दर्जी का कम करने लगे. यहीं पड़ोस में फैजाबाद में उनकी शादी हुई. उनके बच्चे हैं. एक बेटा और एक बेटी. उनके परिवार की आमदनी का कोई खास ज़रिया नहीं है.
छह दिसंबर, 1992 के बलवे में बाहर से आए दंगाइयों ने उनका घर जला दिया, पर अयोध्या के हिंदुओं ने उन्हें और उनके परिवार को बचाया.
जो कुछ मुआवज़ा मिला उससे हाशिम ने अपने छोटे से घर को दोबारा बनवाया और एक पुरानी अम्बेसडर कार ख़रीदी.
बेटा मोहम्मद इक़बाल इसे टैक्सी के तौर पर चलाते है, वह अक्सर हिंदू तीर्थयात्रियों को इसी टैक्सी में अयोध्या के मंदिरों के दर्शन कराते हैं.
*हाशिम एक बात बड़े गर्व से कहते हैं, "हमने बाबरी मस्जिद की पैरवी ज़रुर की. लेकिन राजनीति फ़ायदा उठाने के लिए नही."*
उनके एक साथी बताते हैं कि छह दिसंबर, 1992 के बाद एक बड़े नेता ने उनको दो करोड़ रुपए और पेट्रोल पम्प देने की पेशकश की तो हाशिम ने न केवल ठुकरा दिया बल्कि उस संदेशवाहक को दौड़ा दिया.
*सादगी का रहन-सहन*
हाशिम अंसारी और उनके परिवार का रहन-रहन नहीं बदला. उनके छोटे से कमरे में दो तखत पड़े हैं. यही उनका ड्राइंग रूम है और यही बेड रूम.
दीवार पर बाबरी मस्जिद की पुरानी तस्वीर टंगी है और घर के बाहर अंग्रेज़ी में बाबरी मस्जिद पुनर्निमाण समिति का बोर्ड.
मै पहुंचा तो हो हाशिम जांघिया पहने लेटे थे. जल्दी जल्दी लुंगी और कुरता पहना, सिर पर सफ़ेद टोपी लगाई और बातचीत के लिए तैयार हुए.
वर्ष 95 साल की उम्र में भी उनकी याददाश्त दुरुस्त थीै. वर्ष 1934 का बलवा भी उन्हें याद है, जब हिंदू वैरागी संन्यासियों ने बाबरी मस्जिद पर हमला बोला था.
वो बताते हैं कि ब्रिटिश हुकूमत ने सामूहिक जुर्माना लगाकर मस्जिद की मरम्मत कराई और जो लोग मारे गए उनके परिवारों को मुआवज़ा भी दिया.
सन 1949 में जब विवादित मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखी गई, उस समय प्रशासन ने शांति व्यवस्था के लिए जिन लोगों को गिरफ़्तार किया, उनमे हाशिम भी शामिल थे.
हाशिम कहते हैं, "चूँकि मै सोशल (मेलजोल रखने वाला) हूँ इसलिए लोगों ने मुझसे मुक़दमा करने को कहा और इस तरह मैं बाबरी मस्जिद का पैरोकार हो गया."
*हर हाल में अमन*
बाद में 1961 में जब सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने मुक़दमा किया तो उसमे भी हाशिम एक मुद्दई बने. पुलिस प्रशासन की सूची में नाम होने की वजह से 1975 की इमरजेंसी में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और आठ महीने तक बरेली सेंट्रल जेल में रखे गए.
यह भी एक वजह हो सकती है कि हाशिम ने कांग्रेस को कभी माफ़ नही किया. बाबरी मस्जिद मामले में हर क़दम पर वह कांग्रेस को दोषी मानते हैं.
हाशिम सभी पार्टियों के मुस्मिल नेताओं के भी आलोचक हैं. बातचीत में हाशिम बार-बार जोर देते हैं, "हर हालत में हम अमन चाहते हैं, मस्जिद तो बाद की बात है."
हाशिम कहते हैं, "अगर हम मुक़दमा जीत गए तो भी मस्जिद निर्माण तब तक नहीं शुरू करेंगे, जब तक कि हिंदू बहुसंख्यक हमारे साथ नहीं आ जाते."
हाशिम कहते हैं, "अगर हम मुक़दमा जीत गए तो भी मस्जिद निर्माण तब तक नहीं शुरू करेंगे, जब तक कि हिंदू बहुसंख्यक हमारे साथ नहीं आ जाते."
इसके बावजूद हाशिम के चेहरे पर चिंता के भाव हैं. हाशिम पहले कभी इतना चिंतित नहीं दिखे. चलते-चलते बार-बार कहते हैं – *"हाल ख़बर लेते रहियेगा "*
हाशिम अंसारी साहब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन उनकी यादें हमेशा उनको हम सब के दिलो में ताज़ा रहेंगी *आइये उनकी आत्मा की शांति के लिए दुआ करें*

