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घाघरा की विनाश लीला शुरु

रामसनेहीघाट बाराबंकी। घाघरा नदी की तराई में बसे सैकड़ो गांवो पर बाढ़ का
खतरा मडराने लगा है। प्रति वर्ष आने वाली बाढ़ से जनपद के दर्जनो गांवो
में बसे लोगों को किसी भी खतरे से बचाने के लिए जिला प्रशासन द्वारा की
जाने वाली मुकम्मल तैयारियां अन्त तक धराशायी हो जाती है तथा हजारो एकड़
फसल देखते ही देखते तबाह हो जाती है। साथ ही साथ कई परिवार बेघर हो जाते
है। मालूम हो कि जनपद में तीन तहसीले कृमशः रामसनेहीघाट,सिरौलीगौसपुर, व
रामनगर घाघरा नदी के मुहांने पर बसी है। बरसात के दिनो में आने वाली बाढ
से प्रतिवर्ष यहां के दो सौ गांवो में बसी हजारो की आबादी प्रभावित होती
है। तथा पांच हजार हेक्टेयर से भी अधिक भूमि पर लगी फसले घाघरा नदी की
प्रचण्ड लहरो से तहस नहस हो जाती है। इस बाढ प्रभावितगांवो  तथा कृषि
योग्य भूमि को बचाने के लिए जिला प्रशासन द्वारा हर वर्ष व्यापक स्तर पर
तैयारी तो की जाती है लेकिन बाढ आने पर वही तैयारियां एक एक कर धराशायी
हो जाती है। तथा देखते ही देखते न केवल सैकडो गांवो में पानी भर जाता है
वही हजारो बीघे फसल डूब जाती है। मिली जानकारी के मुताबिक तहसील
रामसनेहीघाट क्षेत्र में 36 ऐसे गांव है जो प्रति वर्ष बाढ की इस
विनाशलीला से बर्बाद होते है, बाढ के चपेट में आने वाले तहसील क्षेत्र के
अतरसुइयां, सिकरी जीवल, उमरहरा, पत्रा, मल्दहा, गढी, सेमरी,बसन्तपुर,
काठाभीट, कोयलावर, ढेमा, गुनौली, टिकरी, जलालपुर बरई,सिहोरिया, कमियार,
एवं बांसगांव ऐसे 16 गांव है जहां घरो में पानी घुस जाता है तथा यहां के
लोगो को उथले स्थानो पर शरण लेनी पडता है। अगर देखा जाय तो तहसील प्रशासन
के मुताबिक घाघरा की बाढ से तीन हजार हेक्टेयर में फैली फसल प्रभावित
होती है। इसी प्रकार सिरौली गौसपुर तहसील में 30 राजस्व गांव प्रति वर्ष
बाढ की चपेट में आते है जहां की 500 एकड फसल प्रति वर्ष बाढ़ की विनाशलीला
में तहस नहस हो जाती है। इसी प्रकार रामनगर तहसील क्षेत्र में घाघरा की
बाढ से 113 गांव प्रति वर्ष प्रभावित होते है। तथा हजारो एकड में लगी
फसलें चौपट हो जाती है। इस तहसील में 36 ऐसे गांव है जो बाढ से बुरी तरह
प्रभावित होते है जबकि 16 मध्यम तथा 61 ऐसे गांव है जहां की कृषि
प्रभावित होती है। बाढ से बचने के लिए बनाये गये बाधो की स्थिति बहुत
अच्छी नही रहती है क्योकि पानी के तेज बहाव में अक्सर बांध कटने लगते है
तथा जब तक बचाव की कोशिसे शुरू की जाती है तब तक बहुत कुछ बर्बाद हो जाता
है। घाघरा नदी ने अपना विनाशकारी तांडव शुरू किया है है तथा घाघरा का
पानी बढने लगा है और कई स्थानो पर कटान करना भी घाघरा ने शुरू कर दिया
है, इस बार प्रशासन ने घाघरा नदी के बाढ की हर स्थिति से निपटने की
तैयारियों के लिए कमर कसनी शुरू कर दी है। लेकिन विडम्बना तो इस बात की
है कि प्रशासन की ओर से बाढ से निपटने की तैयारी हर बार होती है लेकिन जब
घाघरा का विनाशकारी तांडव शुरू होता है तो प्रशासन की सारी तैयारियां
धराशाही हो जाती है क्षेत्र के तमाम गांव बाढ की चपेट से घिर जाते है और
देखते ही देखते घाघरा के विनाशकारी तांडव में बहुत कुछ बर्बाद हो जाता
है। हर वर्ष सरकार के अथक प्रयसो के बाद भी घाघरा नदी के तांडव से कई लोग
बेघर हो जाते है।  बसना उजडना तराई क्षेत्र के लोगो की किस्मत में लिख
गया है, तराई में बसने वाले लोगो द्वारा घाघरा के तांडव मचाने के बाद
तिनका तिनका चुन कर अपना आशियाना बनाना शुरू करते है जब तक उनका आशियान
बनकर तैयार होता है घाघरा फिर अपना कहर बरपा कर उनको तबाही की राह पर
ढकेल देती है। सरकार हर बार घाघरा के तांडव से तराई में बसने वालो को
बचाने के लिए काफी जद्दो जहद करती है लेकिन घाघरा की विनाशलीला के आगे
आखिरकार काफी हदतक सरकार भी नतमस्तक हो जाती है और उसके सामने केवल बचता
है लोगो की जांन की सुरक्षा करना।

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