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धूमधाम से मनाया गया महंत जगन्नाथ बख्श दास का जन्मदिवस

सिरौलीगौसपुर, बाराबंकी। सत्नाम सम्प्रदाय के महान संत महंत जगन्नाथ बख्श
दास का 106वां जन्मदिवस परम्परागत धूमधाम से मनाया गया। श्रीकोटवाधाम बड़ी
गद्दी के महंत नीलेन्द्र बख्श दास जिला पंचायत सदस्य के अगुवाई में सैकड़ो
अनुयाईयों ने महन्त जगन्नाथ बख्श दास की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित की,
और आरती उतारी। सत्नाम सम्प्रदाय के आदि प्रर्वतक समर्थ स्वामी जगजीवन
साहेब के आठवीं पीढ़ी मे जन्मे संत शिक्षाविद एवं राजनेता महन्त जगन्नाथ
बख्श दास के 106वीं जन्म जयंती आज धूमधाम से मनायी गयी। जिला पंचायत
सदस्य बड़ी गद्दी के महंत नीलेन्द्र बख्श की अगुवाई तथा महंत जी के परम
अनुयाई पूर्व प्रधानाचार्य संतराम सैनी के नेतृत्व में सैकड़ो अनुयाई
जगन्नाथ आश्रम के संनिकट स्थित समाधिस्थल पहुंचे और पुष्पांजलि अर्पित कर
आरती उतारी। अनुयाईयों को महंत नीलेन्द्र बख्श ‘नीरज भैय्या‘ ने सम्बोधित
किया। उन्होंने कहा कि रत्न शिरोमणि महंत जगन्नाथ बख्श दास का जन्म पावन
तीर्थ श्रीकोटवाधाम में सावन मास की पूर्णिमा रक्षाबंधन सन् 13 अगस्त
1910 को हुआ था। राजधानी लखनऊ स्थित काल्विन तालुकेदार्स इंटर कॉलेज से
इंटर तक शिक्षा ग्रहण की। तत्पश्चात लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने
राजनीति शास्त्र से एम.ए. किया। राजा महाराजा और तालुकेदार्स घरानों के
सहपाठी मित्रों के बीच राजाओं जैसी शान शौकत मे पले बढ़े महंत जी मे लगता
है कि जीने का कुछ और ही मकशद था। वे जब हाईस्कूल भी नहीं पास हुए थे तभी
महात्मा गांधी से मिलने उनके आश्रम जा पहुंचे थे। वहां पहुंचे इस अल्प
आयु छात्र ने गांधी जी से हरिजनोंद्धार के विषय पर अनेक प्रश्न पूछ डाले।
उन दिनों महात्मा जी द्वारा हरिजनोंद्धार आंदोलन चलाया जा रहा था।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी उनसे बहुत प्रभावित हुए। महन्त जी ने जब उनसे
अपने लिए काम पूछा तो बापू ने कहा कि हरिजनों को तरजीह दें। महन्त जी ने
बापू के कथन को अपने जीवन में शब्दशः उतार लिया, और सदैव अपने निकट
हरिजनों को ही रखा। बात है सन् 1930 की जब वे लखनऊ जा रहे थे। कोई 20
वर्षीय सजीले सुन्दर नवयुवक जगन्नाथ बख्श दास के सिर पर गांधी टोपी सजी
थी। उनकी फोर्ड कार के बोनट पर चरखा युक्त तिरंगा लहरा रहा था। लखनऊ
मार्ग पर सफेदाबाद रेलवे क्रासिंग का फाटक बंद था। उसी समय नवाबगंज सदर
तहसील का सबडिवीजन मजिस्ट्रेट आ पहुंचा। उसने महंत जी से टोपी और कार से
तिरंगा उतारने को कहा, उन्होंने स्पष्ट शब्दों मे दोनो ही बातों पर इंकार
कर दिया। गोरा हुकूमत का अफसर नुमाइंद सदर एसडीएम कोध्रित हुआ। उन्हें
नजरबंद करने का फरमान जारी कर दिया। जिला परिषद (जिला बोर्ड) के तो आजन्म
अध्यक्ष रहे। वे कांग्रेस के अखिल भारतीय अधिवेशन में भाग लेने मुम्बई के
चालिस गांव गये थे। जहां उनका स्वास्थ्य खराब हुआ। भारी अस्वस्थता के बाद
भी महंत जी रामेश्वर भगवान शिव के दर्शन करने गये। वापस फिर चालिस गांव
आए, मुम्बई वहां से करीब पड़ता था लोग उन्हें वहां उपचार के लिये ले गये।
लेकिन कोई सफलता नहीं मिली और उन्होंने 1 जनवरी 1975 को अपना नश्वर शरीर
छोड़ ब्रम्हलीन हुए। उन्हें सर्वविदित था, क्योंकि रामेश्वरम् के दर्शन
पश्चात महन्तश्री ने अपनी डायरी में लिखा है। ‘‘रामेश्वर महादेव के दर्शन
नीके कीन्ह, सबै मनोरथ सुफल भै आशीष शंकर दीन्ह‘‘। मृत्युपरांत उनका शव
बम्बई से दिल्ली फिर लखनऊ लाया गया। जहां से खुली मोटरगाड़ी द्वारा लखनऊ
से श्रीकोटवाधाम शुरू हुई अंतिम यात्रा के दर्शन को जनसैलाब उमड़ पड़ा था।
सड़क के दोनो ओर हजारों हजार अश्रुपूरित आंखे उनके अंतिम दर्शन को आतुर
थी। उनके जीवन का अंतिम संघर्ष मय जिला परिषद का चुनाव वर्ष 1974 का रहा।

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