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स्व. रामसेवक यादव के नाम की शमां जलाए हुए हैं हिमांशु यादव


आसिफ हुसैन...
बाराबंकी। एसेम्बली चुनाव आने वाले हैं। नेताओं की फसल लहलहाने लगी है।
किसी की फसल छोटी है तो कोई थोड़ा हाईब्रिड है। कोई जनता के बीच अपने
पिछले कार्यकाल का बखान कर रहा है तो कोई आने वाले कल के सुनहरे सपने
जनता जनार्दन को दिखाने जुटा है। बाराबंकी जनपद समाजवादियों का गढ़ रहा
है। स्व. रामसेवक यादव सरीखे समाजवादी नेताओं ने बाराबंकी की जमीं को
समाजवाद की खाद से जमकर पालित पोषित किया। पूर्व सांसद रामसागर रावत ने
जब से राजनीति में कदम रखा, तब से लेकर आज तक समाजवादी पार्टी केे लिए ही
कार्य किया। कभी पार्टी नहीं बदली। कभी अपनी तरक्की के लिए समाजवाद से
समझौता नहीं किया। लेकिन स्व. रामसेवक यादव ने जिस समाजवाद को बाराबंकी
में गढ़ा, आज वह समाजवाद गायब सा हो चुका है। बाराबंकी में स्व. रामसेवक
यादव ने जिस समाजवाद की बुनियाद मजबूत की थी, उसमें आमजन के हितार्थ हर
पल, हर क्षण कर्तव्यनिष्ठ बने रहने की झलक दिखाई देती थी। लेकिन वक्त
बदला और साथ ही बदल गयी समाजवाद की परिभाषा। लेकिन स्व. रामसेवक यादव के
पौत्र हिमांशु यादव आज भी अपने दादाजी को पथ प्रदर्शक मानकर समाजवाद और
समाजवादी पार्टी को और मजबूत करने में जुटे हुए हैं। लेकिन बहुत कठिन है
डगर एसेम्बली की। बाराबंकी विधानसभा से समाजवादी पार्टी के लिए टिकट की
होड़ मची हुई है। उधर पूरे शहर में, हिमांशु यादव के पोस्टरों की बाढ़ सी आ
गयी है। जिससे कई लोगों के माथे पर बल पड़ना स्वाभाविक है। बातचीत के
दौरान स्व. रामसेवक यादव के पौत्र हिमांशु यादव ने बताया कि वह अपने
दादाजी के सपनों को पूरा करना चाहते हैं। उनके दादाजी ने हमेशा समाजवादी
पार्टी के हितार्थ कार्य किये थे। लेकिन उनके देहावसान के बाद कुछ अपनों
ने ही सिर्फ स्व. रामसेवक यादव के नाम को जमकर भुनाया। लेकिन समाजवादी
पार्टी के लिए कुछ भी नहीं किया। सम्मेलनों, आयोजनों आदि में मंचासीन
होकर खुद को स्व. रामसेवक यादव का उत्तराधिकारी साबित करने वाले परिवार
के ही चंद लोगों ने उनके नाम को डुबो दिया। श्री यादव ने यह भी बताया कि
पूर्व केन्द्रीय मंत्री और राज्यसभा सांसद बेनी प्रसाद वर्मा, सपा
सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और स्व. रामसेवक यादव तीनों लोग एक दूसरे के
पूरक रहे है। इस लहजे से बेनी बाबू और मुलायम सिंह यादव, दोनों लोग हमारे
दादातुल्य हैं। लेकिन बाराबंकी विधानसभा में जो हो रहा है, वह ठीक नहीं
है। यहां टिकट के लिए लोग अपनों को भुला देते हैं। अपने पुरखों द्वारा
समाजवादी पार्टी के लिए किये गये बलिदानों को याद करना तो दूर रहा,
समाजवादी पुरोधाओं का नाम लेना भी मुनासिब नहीं समझते। इतना ही नहीं, जिस
समय राजेश यादव ‘राजू’ को सदस्य विधान परिषद के लिए टिकट दिया गया था, तो
एक कुनबा इसके प्रबल विरोध में था। लेकिन हिमांशु यादव ने समाजवादी
पार्टी के लिए हितार्थ राजेश यादव ‘राजू’ का जमकर साथ दिया था। अब वही
कुनबा, समाजवादी पार्टी की लुटिया डुबोने में जुटा हुआ है। स्व. रामसवेक
यादव के पौत्र हिमांशु यादव ने आगे कहा कि आये दिन आरोप-प्रत्यारोपों का
दौर अब आम हो चुका है। लेकिन बाराबंकी की जनता भी इस बात से बखूबी वाकिफ
है कि असली समाजवादी कौन है। एक आशियाना छोड़कर दूसरे आशियाने की ओर आने
वाले कब इस आशियाने को उजाड़ दें, कुछ कहा नहीं जा सकता। अभी विधानसभा
चुनाव की अधिसूचना जारी होने में कुछ वक्त बाकी है। लेकिन प्रत्याशी पद
के दावेदारों की चहलकदमी पूरे जोरों पर है। होगा वही जो नेताजी चाहेंगे।
लेकिन स्व. रामसेवक यादव के नाम की शमां आज भी हिमांशु जलाए हुए हैं। एक
शेर और बात खत्म, ‘हवा के एक ही झोंके से बुझ गये होते, अगर हमारे
चिरागों में दम नहीं होता’।

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