शहीद के गांव की बदहाल सड़क से ग्रामवासी सकते में
https://husainijnp.blogspot.com/2016/08/blog-post_83.html
असगर नकी
सुल्तानपुर । देश की सरहद पर शहीद अदीब अनवर ने अपनी जान की कुर्बानी दी थी, लेकिन शहीद की कुर्बानी का जो सिला जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने पूरे गांव को दिया है उससे ग्राम वासी सकते में है । आलम ये है कि शहीद के गांव और घर तक जाने वाला मार्ग अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।
इलाहाबाद-फैज़ाबाद राष्ट्रीय राज्यमार्ग पर द्वारिकागंज क्रासिंग से महज़ 20 क़दम पहले "मौघडा आमकोल" गांव का रास्ता जाता है, ज़िला मुख्यालय से इस गांव की दूरी बस 9 किलोमीटर की है, इसी माटी से जन्मे शहीद अदीब अनवर ने 2002 में देश की सरहद पर अपनी जान की कुर्बानी दी थी, शहीद अदीब की शहादत के बाद से गांव वाले अपने आप पर नाज़ करते हुए शहादत पर चर्चा करते थे, लेकिन इस वक़्त जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने इस गांव की जो उपेक्षा की उसने गांव के लोगों को ज़िन्दगी भर कुर्बानी देने से पहले सोचने पर मजबूर कर दिया है।
दरअसल इस का कारण ये है के शहीद अदीब के गाँव मौघडा आमकोल को जो रस्ता जाता है उसकी बदहाली को देख हर कोई सोचने पर मजबूर है, फिलवक्त इस रस्ते पर क्या गाड़ी और क्या साइकिल पैदल चलना दुश्वार है, हर बरसात गांव वासी खुद अपने हाथों से गिट्टी तोड़कर डालते हैं तो चलना सम्भव हो पाता है।
गांव के लोगों और शहीद के भाई ने कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को हालत से अवगत कराया लेकिन बात सुनकर टाल दिया गया, शहीद के भाई जैनुल आबेदीन हाश्मी की मानें तो एमएलसी शैलेन्द्र प्रताप ने बसपा सरकार के समय वादा किया था कि सपा सरकार में रास्ता दुरुस्त करा दिया जायेगा सरकार आकर जाने को है और बदहाली अपनी जगह कायम है, ये भी बताया गया की तत्कालीन बसपा सरकार में डीएम सुरेश चंद्र शर्मा ने तत्कालीन सीडीओ को निर्देशित किया था लेकिन न अधिकारी और न जनप्रतिनिधि ने इसे प्राथमिकता दिया, नतीजा सामने है, ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि जब एक शहीद का गांव सपा सरकार में विकास से वंचित रहा तो बाकी गांवों का आलम क्या होगा इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
सुल्तानपुर । देश की सरहद पर शहीद अदीब अनवर ने अपनी जान की कुर्बानी दी थी, लेकिन शहीद की कुर्बानी का जो सिला जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने पूरे गांव को दिया है उससे ग्राम वासी सकते में है । आलम ये है कि शहीद के गांव और घर तक जाने वाला मार्ग अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।
इलाहाबाद-फैज़ाबाद राष्ट्रीय राज्यमार्ग पर द्वारिकागंज क्रासिंग से महज़ 20 क़दम पहले "मौघडा आमकोल" गांव का रास्ता जाता है, ज़िला मुख्यालय से इस गांव की दूरी बस 9 किलोमीटर की है, इसी माटी से जन्मे शहीद अदीब अनवर ने 2002 में देश की सरहद पर अपनी जान की कुर्बानी दी थी, शहीद अदीब की शहादत के बाद से गांव वाले अपने आप पर नाज़ करते हुए शहादत पर चर्चा करते थे, लेकिन इस वक़्त जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने इस गांव की जो उपेक्षा की उसने गांव के लोगों को ज़िन्दगी भर कुर्बानी देने से पहले सोचने पर मजबूर कर दिया है।
दरअसल इस का कारण ये है के शहीद अदीब के गाँव मौघडा आमकोल को जो रस्ता जाता है उसकी बदहाली को देख हर कोई सोचने पर मजबूर है, फिलवक्त इस रस्ते पर क्या गाड़ी और क्या साइकिल पैदल चलना दुश्वार है, हर बरसात गांव वासी खुद अपने हाथों से गिट्टी तोड़कर डालते हैं तो चलना सम्भव हो पाता है।
गांव के लोगों और शहीद के भाई ने कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को हालत से अवगत कराया लेकिन बात सुनकर टाल दिया गया, शहीद के भाई जैनुल आबेदीन हाश्मी की मानें तो एमएलसी शैलेन्द्र प्रताप ने बसपा सरकार के समय वादा किया था कि सपा सरकार में रास्ता दुरुस्त करा दिया जायेगा सरकार आकर जाने को है और बदहाली अपनी जगह कायम है, ये भी बताया गया की तत्कालीन बसपा सरकार में डीएम सुरेश चंद्र शर्मा ने तत्कालीन सीडीओ को निर्देशित किया था लेकिन न अधिकारी और न जनप्रतिनिधि ने इसे प्राथमिकता दिया, नतीजा सामने है, ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि जब एक शहीद का गांव सपा सरकार में विकास से वंचित रहा तो बाकी गांवों का आलम क्या होगा इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है।


