सम्मान के लिये एमबीए, पीएचडी मृतक आश्रितों की सरकार से दो टूक
https://husainijnp.blogspot.com/2016/09/blog-post_77.html
अजमी रिज़वी
बाराबंकी। बड़े बुजुर्गों से हमेशा एक सूक्ति सुनता आया ‘विद्वान सर्वत्र
पूज्यते’। सूक्ति को सिर्फ पढ़ा ही नहीं समझा भी। विद्वान हर जगह पूजा
जाता है। लेकिन दुर्भाग्य कि उत्तर प्रदेश में विद्वता नहीं डिग्री पूजी
जाती है। यहां शिक्षा का मोल नहीं अंकों की मान्यता है। यूपी सरकार सिर्फ
उन्हीं को शिक्षक मानती है जो शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करते हैं।
अंकों पर मेरिट बनती है। सरकारी शिक्षक बनते हैं। सुबह सात बजे स्कूल के
समय पर साढ़े आठ बजे विद्यालय पहुंचते हैं और समय से पहले ही स्कूल से
रफूचक्कर हो उठते हैं। लेकिन जो विद्या को अपना सर्वस्व मानकर दिनरात एक
करते हुए पीएचडी, एमबीए, एमसीए आदि करके मृतक आश्रित आते हैं, वह सरकार
की नजर में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी बनने के अलावा कोई पात्रता नहीं
रखते हैं। विडम्बना ही कही जायेगी कि जिन शिक्षकों ने अपना सर्वस्व
छात्रों के भविष्य को उज्जवल बनाने में न्यौछावर कर दिया, उन्हीं की
संतानें बेसिक शिक्षा विभाग की नजरन्दाजी के चलते चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी
बनने को मजबूर हैं। मृतक आश्रितों को उत्तर प्रदेश सरकार शिक्षक नहीं
मानती। जी हां, प्राथमिक शिक्षकों के उच्च शिक्षा प्राप्त वेल एजूकेटेड
मृतक आश्रित चपरासी हैं और इण्टर उत्तीर्ण शिक्षामित्रों का समायोजन कर
उन्हें सहायक अध्यापक बना दिया जाता है। ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ की कहावत
को स्वयं सूबा सरकार चरितार्थ करने में जुटी हुई है। शायद सरकार की मंशा
नौनिहालों को मात्र साक्षर बनाने की है न कि शिक्षित बनाने की। अपना नाम
लिखना आ जाये, दूसरों के नाम पढ़ लिये जायें और क्या चाहिए सरकार को। शायद
यही कारण है कि विगत 05 वर्षों से न्याय की लड़ाई लड़ रहे प्राथमिक
शिक्षकों के मृतक आश्रितों के हाथों में सूबे की सरकारों ने सिर्फ
आश्वासनों का झुनझुना ही पकड़ाया है। उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक मृतक आश्रित
शिक्षणेत्तर कर्मचारी संघ ने अपने हक के लिये जो मोर्चा सन् 2011 में
खोला था अब वह वृहद रूप ले चुका है। उत्तर प्रदेश के समस्त जनपदों में
संघ की आमद हो चुकी है। इतना ही नहीं, संघ की कमान जिस युवा के हाथों में
है, उसने कभी झुकना शायद सीखा ही नहीं। उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक मृतक
आश्रित शिक्षणेत्तर कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष जुबेर अहमद ने जो
बीड़ा उठाया है, उस कारवां में दिनोंदिन हजारों की तादात में प्राथमिक
शिक्षकों के मृतक आश्रितों की आमद जारी है। साथ ही जारी है संघर्ष
अव्यवस्था के खिलाफ, संघर्ष अपने अस्तित्व की रक्षा का, संघर्ष अपने
सम्मान के प्रति, संघर्ष सरकारों के मनमाने रवैये के खिलाफ और संघर्ष
समाज में शिक्षा का सर्वोत्तम रूप प्रस्तुत करने के लिए।
प्रदेश अध्यक्ष श्री अहमद ने बताया कि बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत
शिक्षकों की सेवाकाल में मृत्यु होने के बाद उनके मृतक आश्रितों की उसकी
शैक्षणिक योग्यता के आधार पर नियुक्त न करते हुए केवल चतुर्थ श्रेणी के
पद पर ही नियुक्त कर उनके साथ अन्याय किया गया है। जबकि अन्य विभागों में
मृतक आश्रितों को उनकी शैक्षिक योग्यता के अनुसार नियुक्त किया जाता है।
साथ ही, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 लागू होने के पूर्व बेसिक शिक्षा
विभाग में मृतक शिक्षकों के आश्रित को विभाग, सेवारत प्रशिक्षण कराकर
सहायक अध्यापक पद पर नियुक्त करता था। लेकिन उक्त अधिनियम के लागू होने
के बाद उच्च स्तरीय योग्यता (पीएचसी, एमबीए, एमसीए, एलएलबी, एमटेक,
बीटेक) आदि होते हुए भी मृतक आश्रितों को चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बना
दिया गया है। जिससे उनकी उच्च योग्यताओं का उपयोग शिक्षा के कार्यक्षेत्र
में नहीं हो पा रहा है।
श्री अहमद ने आगे बताया कि मृतक आश्रित कर्मचारी स्नातक, परास्नातक
होते हुए भी 15-16 सालों से चतुर्थ श्रेणी पद पर ही कार्यरत हैं। उनको
योग्यतानुसार विभाग ने पदोन्नति दी ही नहीं। सालों से अपना मानसिक एवं
शारीरिक शोषण करवा रहे प्राथमिक शिक्षकों के मृतक आश्रितों ने अब मोर्चा
खोल दिया है।
राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री तक, कोई भी ऐसा नहीं बचा, जिससे अपना
दर्द इन लोगों ने कहा न हो। लेकिन आज तक मिला तो सिर्फ आश्वासन।
सफेदपोशों को तो हर कोई अपना वोट बैंक ही दिखायी देता है। संघर्ष की अलख
जगाये हुए श्री जुबेर ने आगे बताया कि बीती 07 मई 2016 को मुख्यमंत्री ने
बेसिक शिक्षा प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर इस प्रकरण में शासन स्तर से
विचार कर कार्रवाई करने की बात कही। प्रमुख सचिव ने भी अपने कर्तव्यों की
इतिश्री पत्र पर मात्र ‘पुट अप इन फाइल’ लिखकर कर डाली। फाइल में पत्र
लगाने की प्रथा का एक बार फिर चलन हुआ और तब से लेकर आज तक वह पत्र फाइल
में ही लगा है।
श्री अहमद ने अपनी मांगों का जिक्र करते हुए कहा कि बेसिक शिक्षा परिषद
द्वारा संचालित पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में कार्यरत मृतक आश्रित
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जो स्नातक, परस्नातक है उन्हें पूर्व की भाति
सेवारत प्रशिक्षण दिलाते हुए टीईटी में बैठने का अवसर प्रदान किया जाये
और सफलता पूर्वक टीईटी उत्तीर्ण कर लेने के उपरान्त सहायक अध्यापक पद पर
नियुक्त किया जाये। बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा संचालित पूर्व माध्यमिक
विद्यालयों में कार्यरत मृतक आश्रित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जो इण्टर
मीडिएट की योग्यता रखते है उन्हें लिपिक के पद पर पदोन्नति दी जाये।
बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा संचालित पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में
कार्यरत मृतक आश्रित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का पद नाम कार्यालय सहायक,
विद्यालय सहायक किया जाये और उसकी नियमावली बनायी जायें।
प्राथमिक शिक्षकों के मृतक आश्रितों की अपने हक के लिए शुरू की गई जंग
दिनोंदिन तेज होती जा रही है। शिक्षा जिन्होनें सिर्फ ग्रहण नहीं की,
अपने अंदर आत्मसात की, वह अपने हक के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
खाकी का कहर भी झेलना पड़ सकता है। फिर भी, सम्मान के लिए आगामी 15
सितम्बर को सूबा राजधानी में इकठ्ठा होंगे। ताकि सूबा सरकार शायद इनके
सम्मान के प्रति जागे और सूबे के नौनिहालों को उनकी सही दिशा मिल सके।
बाराबंकी। बड़े बुजुर्गों से हमेशा एक सूक्ति सुनता आया ‘विद्वान सर्वत्र
पूज्यते’। सूक्ति को सिर्फ पढ़ा ही नहीं समझा भी। विद्वान हर जगह पूजा
जाता है। लेकिन दुर्भाग्य कि उत्तर प्रदेश में विद्वता नहीं डिग्री पूजी
जाती है। यहां शिक्षा का मोल नहीं अंकों की मान्यता है। यूपी सरकार सिर्फ
उन्हीं को शिक्षक मानती है जो शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करते हैं।
अंकों पर मेरिट बनती है। सरकारी शिक्षक बनते हैं। सुबह सात बजे स्कूल के
समय पर साढ़े आठ बजे विद्यालय पहुंचते हैं और समय से पहले ही स्कूल से
रफूचक्कर हो उठते हैं। लेकिन जो विद्या को अपना सर्वस्व मानकर दिनरात एक
करते हुए पीएचडी, एमबीए, एमसीए आदि करके मृतक आश्रित आते हैं, वह सरकार
की नजर में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी बनने के अलावा कोई पात्रता नहीं
रखते हैं। विडम्बना ही कही जायेगी कि जिन शिक्षकों ने अपना सर्वस्व
छात्रों के भविष्य को उज्जवल बनाने में न्यौछावर कर दिया, उन्हीं की
संतानें बेसिक शिक्षा विभाग की नजरन्दाजी के चलते चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी
बनने को मजबूर हैं। मृतक आश्रितों को उत्तर प्रदेश सरकार शिक्षक नहीं
मानती। जी हां, प्राथमिक शिक्षकों के उच्च शिक्षा प्राप्त वेल एजूकेटेड
मृतक आश्रित चपरासी हैं और इण्टर उत्तीर्ण शिक्षामित्रों का समायोजन कर
उन्हें सहायक अध्यापक बना दिया जाता है। ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ की कहावत
को स्वयं सूबा सरकार चरितार्थ करने में जुटी हुई है। शायद सरकार की मंशा
नौनिहालों को मात्र साक्षर बनाने की है न कि शिक्षित बनाने की। अपना नाम
लिखना आ जाये, दूसरों के नाम पढ़ लिये जायें और क्या चाहिए सरकार को। शायद
यही कारण है कि विगत 05 वर्षों से न्याय की लड़ाई लड़ रहे प्राथमिक
शिक्षकों के मृतक आश्रितों के हाथों में सूबे की सरकारों ने सिर्फ
आश्वासनों का झुनझुना ही पकड़ाया है। उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक मृतक आश्रित
शिक्षणेत्तर कर्मचारी संघ ने अपने हक के लिये जो मोर्चा सन् 2011 में
खोला था अब वह वृहद रूप ले चुका है। उत्तर प्रदेश के समस्त जनपदों में
संघ की आमद हो चुकी है। इतना ही नहीं, संघ की कमान जिस युवा के हाथों में
है, उसने कभी झुकना शायद सीखा ही नहीं। उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक मृतक
आश्रित शिक्षणेत्तर कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष जुबेर अहमद ने जो
बीड़ा उठाया है, उस कारवां में दिनोंदिन हजारों की तादात में प्राथमिक
शिक्षकों के मृतक आश्रितों की आमद जारी है। साथ ही जारी है संघर्ष
अव्यवस्था के खिलाफ, संघर्ष अपने अस्तित्व की रक्षा का, संघर्ष अपने
सम्मान के प्रति, संघर्ष सरकारों के मनमाने रवैये के खिलाफ और संघर्ष
समाज में शिक्षा का सर्वोत्तम रूप प्रस्तुत करने के लिए।
प्रदेश अध्यक्ष श्री अहमद ने बताया कि बेसिक शिक्षा विभाग में कार्यरत
शिक्षकों की सेवाकाल में मृत्यु होने के बाद उनके मृतक आश्रितों की उसकी
शैक्षणिक योग्यता के आधार पर नियुक्त न करते हुए केवल चतुर्थ श्रेणी के
पद पर ही नियुक्त कर उनके साथ अन्याय किया गया है। जबकि अन्य विभागों में
मृतक आश्रितों को उनकी शैक्षिक योग्यता के अनुसार नियुक्त किया जाता है।
साथ ही, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 लागू होने के पूर्व बेसिक शिक्षा
विभाग में मृतक शिक्षकों के आश्रित को विभाग, सेवारत प्रशिक्षण कराकर
सहायक अध्यापक पद पर नियुक्त करता था। लेकिन उक्त अधिनियम के लागू होने
के बाद उच्च स्तरीय योग्यता (पीएचसी, एमबीए, एमसीए, एलएलबी, एमटेक,
बीटेक) आदि होते हुए भी मृतक आश्रितों को चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बना
दिया गया है। जिससे उनकी उच्च योग्यताओं का उपयोग शिक्षा के कार्यक्षेत्र
में नहीं हो पा रहा है।
श्री अहमद ने आगे बताया कि मृतक आश्रित कर्मचारी स्नातक, परास्नातक
होते हुए भी 15-16 सालों से चतुर्थ श्रेणी पद पर ही कार्यरत हैं। उनको
योग्यतानुसार विभाग ने पदोन्नति दी ही नहीं। सालों से अपना मानसिक एवं
शारीरिक शोषण करवा रहे प्राथमिक शिक्षकों के मृतक आश्रितों ने अब मोर्चा
खोल दिया है।
राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री तक, कोई भी ऐसा नहीं बचा, जिससे अपना
दर्द इन लोगों ने कहा न हो। लेकिन आज तक मिला तो सिर्फ आश्वासन।
सफेदपोशों को तो हर कोई अपना वोट बैंक ही दिखायी देता है। संघर्ष की अलख
जगाये हुए श्री जुबेर ने आगे बताया कि बीती 07 मई 2016 को मुख्यमंत्री ने
बेसिक शिक्षा प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर इस प्रकरण में शासन स्तर से
विचार कर कार्रवाई करने की बात कही। प्रमुख सचिव ने भी अपने कर्तव्यों की
इतिश्री पत्र पर मात्र ‘पुट अप इन फाइल’ लिखकर कर डाली। फाइल में पत्र
लगाने की प्रथा का एक बार फिर चलन हुआ और तब से लेकर आज तक वह पत्र फाइल
में ही लगा है।
श्री अहमद ने अपनी मांगों का जिक्र करते हुए कहा कि बेसिक शिक्षा परिषद
द्वारा संचालित पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में कार्यरत मृतक आश्रित
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जो स्नातक, परस्नातक है उन्हें पूर्व की भाति
सेवारत प्रशिक्षण दिलाते हुए टीईटी में बैठने का अवसर प्रदान किया जाये
और सफलता पूर्वक टीईटी उत्तीर्ण कर लेने के उपरान्त सहायक अध्यापक पद पर
नियुक्त किया जाये। बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा संचालित पूर्व माध्यमिक
विद्यालयों में कार्यरत मृतक आश्रित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जो इण्टर
मीडिएट की योग्यता रखते है उन्हें लिपिक के पद पर पदोन्नति दी जाये।
बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा संचालित पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में
कार्यरत मृतक आश्रित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का पद नाम कार्यालय सहायक,
विद्यालय सहायक किया जाये और उसकी नियमावली बनायी जायें।
प्राथमिक शिक्षकों के मृतक आश्रितों की अपने हक के लिए शुरू की गई जंग
दिनोंदिन तेज होती जा रही है। शिक्षा जिन्होनें सिर्फ ग्रहण नहीं की,
अपने अंदर आत्मसात की, वह अपने हक के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
खाकी का कहर भी झेलना पड़ सकता है। फिर भी, सम्मान के लिए आगामी 15
सितम्बर को सूबा राजधानी में इकठ्ठा होंगे। ताकि सूबा सरकार शायद इनके
सम्मान के प्रति जागे और सूबे के नौनिहालों को उनकी सही दिशा मिल सके।

