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अज़ादारी मजलिस और मातम ज़ुल्म के खिलाफ युद्ध है | एस एम् मासूम

 अज़ादारी


जौनपुर मुहर्रम का चाँद होते  ही पूरी दुनिया की तरह जौनपुर में भी मजलिस माता  नौहा जिसे अज़ादारी कहते हैं का दौर शुरू हो  जाता है | सोशल मीडिया के बादशाह  जिन्होंने जौनपुर को हाईटेक बनाया और आज  तक  लोगों को वेबपोर्टल की आवश्यकता आज के परिवेश में की अहमियत समझा रहे हैं को आज  हर पत्रकार और सामाजिक सरोकारों से जुडा व्यक्ति जानता है  |

एस एम् मासूम जी ने इस बार आवश्यकता महसूस की समाज में पैगाम ऐ  इंसानियत दी जाए और यह संभव हुआ जब उन्होंने इमाम बाडा बड़े इमाम में इस वर्ष पाच  मजलिसें पढी  जिसका  विषय था अज़ादारी , मजलिस ज़ुल्म के खिलाफ आतंकवाद के खिलाफ एक जंग है |

जनाब एस एम् मासूम ने कहा हर  साल  मुहर्रम  का  चाँद  दिखाई  देते  ही ,हर तरफ कर्बला, या हुसैन की सदा सुनाई देने लगती है, लोगों की ज़बान पे पैगाम है इंसानियत,सब्र ए हुसैन (ए.स) और कुर्बानियों  की कहानी फिर से सुनाई देने लगती है|

 अज़ादारी
१० मुहर्रम आशूरा का रोज़  है जिस दिन इमाम हुसैन को ज़ालिम बादशाह  यजीद ने भूखा  प्यासा शहीद  किया था | इस दिन  मुसलमान जो ग़म ए हुसैन मनाते हैं, शाम से ही घरों  मैं चूल्हा नहीं जलाते, बिस्तर  पे आराम से नहीं सोते, दिन मैं भी शाम के पहले खाना नहीं खाते और पानी नहीं पीते.दिन भर  रोते हैं शोक सभाओं मैं बैठ के और्मतम करते हैं.  या यह कह लें की ऐसे रहते हैं जैसे अभी आज ही किसी का इन्तेकाल हुआ है. यह इतिहास की ऐसी शोकपूर्ण घटना है कि जिसकी यादें १३७३  वर्ष से सारी दुनिया में लोग  मनाते हैं|



कितनी जगहों पर ग़ैर मुस्लिम भी इसको अपने रंग में मनाते हैं. मुहर्रम  का  चाँद  देखते  ही , ना  सिर्फ  मुसलमानों  के  दिल  और  आँखें  ग़म  ऐ हुसैन  से  छलक  उठती  हैं , बल्कि हिन्दुओं  की  बड़ी   बड़ी   शख्सियतें  भी  बारगाहे  हुस्सैनी  में  ख़ेराज ए अक़ीदत पेश  किये  बग़ैर  नहीं  रहतीं|

एस एम् मासूम ने कहा  जो अज़ादारी करता है  हुसैन पे रोता है वो ज़ुल्म का साथ कभी नहीं देता |

यह इतिहास की ऐसी शोकपूर्ण घटना है कि जिसकी यादें साढ़े तेरह सौ वर्ष से मुसलमान और  ग़ैर  मुसलमान  सभी  मनाते हैं और मनाते  रहेंगे |




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