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रावणत्व के विनाश से ही शान्ति संभवः रामेश्वरानन्द जी महाराज

जौनपुर। अहंकारी रावण तो त्रेता युग में मारा गया किन्तु समाज में आज भी रावणत्व विद्यमान है। आज रावण का नाम बदल गया है। आज भूख का रावण, गरीबी का मेघनाद व मूर्खता का कुम्भकर्ण समाज में पूरे जोर पर है। उक्त विचार श्री गुरू भारी वीर बाबा सोहम सत्संग समिति द्वारा कुल्हनामऊ में आयोजित 5 दिवसीय संगीतमय श्री रामकथा के समापन अवसर पर कथावाचक राष्ट्रीय मानस प्रवक्ता पं. श्री रामेश्वरानन्द जी महाराज ने व्यक्त किया। इस मौके पर उमड़ी कथाप्रेमियों की भीड़ के बीच महाराज जी ने कहा कि श्रमिक देवता अपना खून देकर क्षीण प्राण हो रहे हैं। सारी दुनिया ही लंका जैसी होती जा रही है। एक तरफ सोने का संसार और दूसरी ओर दानवी चक्र में पिसे गरीबों के आंसूओं का समुद्र और समुद्र के उस पार के वासी यह लंका लोगों की छाती पर आतंक का डंका बजा रहे है। उन्होंने कहा कि समाज से निकलकर अगर कोई पूछता है कि कहां है सत्य, न्याय तो एक मौन उत्तर मिलता है कि सभी लंका की नींव के नीचे दबा दिये गये हैं, इसलिये जब तक रावणत्व का विनाश नहीं होगा तब तक शान्ति की स्थापना संभव नहीं है। इस मौके पर आये कथाप्रेमियों का स्वागत एवं आभार ज्ञापन संस्थापक रविन्द्र नाथ मिश्र ओम ने किया। इस अवसर पर आनन्द मिश्र, मनोज मिश्र, संजय मिश्र, अरविन्द मिश्र, प्रमोद मिश्र, विनय सिंह, विष्णु नारायण सिंह, भारत सिंह, प्रदीप मिश्र, जितेन्द्र मिश्र, जिवेश मिश्र, मनीष मिश्र, शिववचन गौड़, सदानन्द गुप्ता उपस्थित रहे।


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