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जीवन जीने की कला सिखलाता है श्रीरामचरितमानसः रामेश्वरानन्द


जौनपुर। आज समाज में पापाचार व भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है। श्रीरामचरितमानस हमें जीवन जीने की कला सिखलाता है। यह योग का ग्रंथ है लेकिन जीवन में प्रयोग का ग्रंथ यही है। उक्त विचार श्री गुरू भारी वीर बाबा सोहम सत्संग समिति द्वारा कुल्हनामऊ में आयोजित संगीतमय श्री रामकथा में कथावाचक राष्ट्रीय मानस प्रवक्ता श्री रामेश्वरानन्द जी महाराज ने व्यक्त किया। बीते 7 नवम्बर से शुरू रामकथा में उमड़े जनसैलाब के बीच महाराज जी ने कहा कि आज व्यक्ति जीवन ढो रहा है और रो भी रहा है। गीता और भागवत हमें मरने की कला सिखलाते हैं किन्तु जीवन जीने की कला श्रीरामचरितमानस जैसे ग्रंथ ही सिखला सकते हैं। इस मौके पर समिति के अध्यक्ष मायाशंकर मिश्र ने बताया कि रामकथा का समापन 11 नवम्बर को होगा जिसके बाद 12 नवम्बर को प्रातः 10 बजे स हवन एवं प्रसाद वितरण होगा। इस अवसर पर आनन्द मिश्र, मनोज मिश्र, संजय मिश्र, अरविन्द मिश्र, प्रमोद मिश्र, विनय सिंह, विष्णु नारायण सिंह, भारत सिंह, प्रदीप मिश्र, जितेन्द्र मिश्र, जिवेश मिश्र, मनीष मिश्र, शिव बचन गौड़, सदानन्द गुप्ता सहित तमाम लोग उपस्थित रहे। आयोजक रविन्द्र नाथ मिश्र ने सभी आगतों का स्वागत किया।


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