सिर कटा मुर्गा 18 महीने तक कैसे जीवित रहा?
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सिर कटे इंसानों की कहानियॉ या फिल्में तो आपने देखी होंगी मगर क्या सिर कटने के बावजूद लंबे समय तक जीवित रहने वाले मुर्गे की कहानी के बारे में आप जानते हैं?
यह माइक नामक ऐसा मुर्गा है जिसका सिर 10 सितंबर 1945 को एक अमरीकी फार्मर लोईड ओल्सन ने काटा था लेकिन वह मरा नहीं बल्कि 18 महीने तक जीवित रहा।
माइक जिसे मीरेकल माइक या सर कटा माइक भी कहा जाता है, जब वह पांच साल का था तब लोईड ओल्सन ने उसका सिर काटा था क्योंकि उसकी पत्नी क्लारा ने अपनी माँ को रात के खाने के लिए आमंत्रित किया था।
ओल्सन को पता था कि उसकी सास हमेशा मुर्गे की भुनी गर्दन को पसंद करती है, इसीलिए उसने गर्दन का अधिकांश हिस्सा बचाते हुए सिर के अगले हिस्से को काटा, मगर ग़लती से उसकी कुल्हाड़ी ने मुर्गे की जीवन नाणी, एक कान और दिमाग़ के अधिकांश हिस्से को नुक़सान नहीं पहुंचाया।
यही कारण है कि लोईड ओल्सन यह देखकर हैरान रह गया कि माइक (मुर्गा) मरा नहीं बल्कि पूरे 18 महीने तक बिना सिर के जीवित रहा।
सिर कटने के बाद माइक मुर्गियों की तरह यहाँ वहाँ भागता रहा मगर जल्द ही आराम से बैठ गया और केवल यही नहीं उसने ज़मीन पर भोजन भी उठाने की कोशिश की, इस दौरान लोईड ओल्सन उसे छोड़कर चला गया और अगली सुबह मुर्गे को ऐसी स्थिति में सोते हुए देखा कि उसने अपने सिर के कटे हुए हिस्से को पंखों में छिपा रखा था, जिसके बाद लोईड को चिंता हुई अब सिर कटे मुर्गे को खिलाया कैसे जाए, ओल्सन ने मुर्गे की शह रग के रास्ते भोजन और आई ड्रापर की मदद से पानी देना शुरू कर दिया।
माइक नामी मुर्गे के इस चमत्कारी जीवन के बारे में अरकांसास विश्वविद्यालय के न्यूरो बाइयोलोजिस्ट और पोल्ट्री साईकोलोजिस्ट वाइन जे कवेनज़ल ने बताया कि चूंकि एक मुर्गी की खोपड़ी दो बड़े सूराख़ों पर अधारित होती है ताकि उसकी आंखें अपनी जगह पर रहें, इसलिए दिमाग़ शेष जगह पर 45 डिग्री के कोण से मौजूद होता है।
इसका मतलब यह भी है कि अगर सिर का अगला भाग उड़ाया जाए तो मस्तिष्क का बड़ा हिस्सा ठीक-ठाक हालत में मौजूद होता है और सक्रिय रहता है जो बचने के लिए आवश्यक होता है।
माइक का हराम मग़्ज़ उसकी आँखों के कई बड़े सूराख़ों के नीचे था और कुल्हाड़ी का सही वार न होने के कारण वे बुनियादी कार्यों और सांस लेने की क्षमता रखता था, लेकिन वह अपनी आंखों से ज़रूर वंचित हो गया।
माइक नामी मुर्गा 18 महीने की अपनी चमतकारी ज़िंदगी जीने के बाद उसकी शह रग में खाना खाते समय कुछ फंस जाने के कारण दम घुटने से मर गया।
गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल इस माइक नामी मुर्गे की मृत्यु के 70 साल बाद भी ओल्सन के शहर कोलूराडो में उसको याद किया जाता है और यहां के स्थानीय लोग हर साल मई महीने के तीसरे सप्ताह में माइक दी हेडलेस नामी चिकन महोत्सव का आयोजन करते हैं।
यह माइक नामक ऐसा मुर्गा है जिसका सिर 10 सितंबर 1945 को एक अमरीकी फार्मर लोईड ओल्सन ने काटा था लेकिन वह मरा नहीं बल्कि 18 महीने तक जीवित रहा।
माइक जिसे मीरेकल माइक या सर कटा माइक भी कहा जाता है, जब वह पांच साल का था तब लोईड ओल्सन ने उसका सिर काटा था क्योंकि उसकी पत्नी क्लारा ने अपनी माँ को रात के खाने के लिए आमंत्रित किया था।
ओल्सन को पता था कि उसकी सास हमेशा मुर्गे की भुनी गर्दन को पसंद करती है, इसीलिए उसने गर्दन का अधिकांश हिस्सा बचाते हुए सिर के अगले हिस्से को काटा, मगर ग़लती से उसकी कुल्हाड़ी ने मुर्गे की जीवन नाणी, एक कान और दिमाग़ के अधिकांश हिस्से को नुक़सान नहीं पहुंचाया।
यही कारण है कि लोईड ओल्सन यह देखकर हैरान रह गया कि माइक (मुर्गा) मरा नहीं बल्कि पूरे 18 महीने तक बिना सिर के जीवित रहा।
सिर कटने के बाद माइक मुर्गियों की तरह यहाँ वहाँ भागता रहा मगर जल्द ही आराम से बैठ गया और केवल यही नहीं उसने ज़मीन पर भोजन भी उठाने की कोशिश की, इस दौरान लोईड ओल्सन उसे छोड़कर चला गया और अगली सुबह मुर्गे को ऐसी स्थिति में सोते हुए देखा कि उसने अपने सिर के कटे हुए हिस्से को पंखों में छिपा रखा था, जिसके बाद लोईड को चिंता हुई अब सिर कटे मुर्गे को खिलाया कैसे जाए, ओल्सन ने मुर्गे की शह रग के रास्ते भोजन और आई ड्रापर की मदद से पानी देना शुरू कर दिया।
माइक नामी मुर्गे के इस चमत्कारी जीवन के बारे में अरकांसास विश्वविद्यालय के न्यूरो बाइयोलोजिस्ट और पोल्ट्री साईकोलोजिस्ट वाइन जे कवेनज़ल ने बताया कि चूंकि एक मुर्गी की खोपड़ी दो बड़े सूराख़ों पर अधारित होती है ताकि उसकी आंखें अपनी जगह पर रहें, इसलिए दिमाग़ शेष जगह पर 45 डिग्री के कोण से मौजूद होता है।
इसका मतलब यह भी है कि अगर सिर का अगला भाग उड़ाया जाए तो मस्तिष्क का बड़ा हिस्सा ठीक-ठाक हालत में मौजूद होता है और सक्रिय रहता है जो बचने के लिए आवश्यक होता है।
माइक का हराम मग़्ज़ उसकी आँखों के कई बड़े सूराख़ों के नीचे था और कुल्हाड़ी का सही वार न होने के कारण वे बुनियादी कार्यों और सांस लेने की क्षमता रखता था, लेकिन वह अपनी आंखों से ज़रूर वंचित हो गया।
माइक नामी मुर्गा 18 महीने की अपनी चमतकारी ज़िंदगी जीने के बाद उसकी शह रग में खाना खाते समय कुछ फंस जाने के कारण दम घुटने से मर गया।
गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल इस माइक नामी मुर्गे की मृत्यु के 70 साल बाद भी ओल्सन के शहर कोलूराडो में उसको याद किया जाता है और यहां के स्थानीय लोग हर साल मई महीने के तीसरे सप्ताह में माइक दी हेडलेस नामी चिकन महोत्सव का आयोजन करते हैं।

