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मंगल पर पहुंचा पहला मानव भटका, नासा परेशान, हैरत में दुनिया !

दुनिया की सबसे बड़ी अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के द्वारा हाल ही में मंगल ग्रह पर खारे पानी की उपलब्धता का प्रमाण देने के बाद यह संभावना प्रबल हो गई है कि मंगल पर जीवन है। नासा के नये डाटा की मानें तो मंगल ग्रह की सतह पर बहता हुआ पानी मौजूद है और इसी तरल पानी की मौजूदगी बताती है कि मंगल ग्रह अभी भी भौगोलिक रूप से सक्रिय है। जाहिर है जहां एक ओर नई खोज से मंगल ग्रह पर जीवन के होने की संभावना भी बढ़ गई है, वहीं यह पूरी मानव सभ्यता की आंखों में अब एक नया सपना आकार लेने लगा है कि आखिर मंगल पर पहला मानव यान कब और कैसे भेजा जाए?
निश्चित ही इस सपने की संभावना के साथ, इतना तो तय है कि यदि मानव मंगल पर पहुंच गया तो उससे जुड़ी खबरों को देखने वाले इतने होंगे कि उनकी संख्या गिनना मुश्किल हो जाएगा। यही नहीं, किसी भी संभावित अन्जान समस्या से जूझने के लिए मानव की गतिविधियों पर निगाह रखने की भी महती आवश्यकता होगी और वहां रहने वालों को पल-पल गाइड भी करना होगा। ऐसे में मंगल के लाइव प्रसारण एवं पृथ्वी से जुडी सूचनाओं का आदान-प्रदान पलक झपकते कैसे संभव होगा? सोचिये क्या इंटरनेट काम आ सकता है?
'द मार्शियन' के जरिये मनुष्य पहुंचेगा मंगल पर : वैसे मंगल पर मानव के पहुंचने की बात को एक फंतासी भी मानें तो 2 अक्टूबर यानी की कल लांच हो रही मैट डैमन की फिल्म 'द मार्शियन' चार चांद लगाने की तैयारी में है। असल में फिल्म 2011 में एंडी वीयर के लिखे नॉवल 'द मार्शियन' पर ही आधारित है जिसका निर्देशन रिडले स्काट ने किया है। यह कहानी मंगल की संपर्क गाथा के पहलू सामने रखती है। फिल्म में मैट डैमन एक अंतरिक्ष यात्री मार्क वाटने बने हैं, जो पहली बार मंगल की यात्रा पर गया है ।
मिशन में खराबी आने के चलते उसका संपर्क पृथ्वी और अपने अंतरिक्ष यान से टूट जाता है और धरतीवासी उसे मृत मान लेते हैं। यही नहीं, उसका क्रू भी उसे इस अकेले, अन्जान और जीवित रहने की दृष्टि से कमोबेश असंभव गृह पर छोड़कर चला जाता है, लेकिन, वाटने जीवित रहने की आकांक्षा में सभी विषम परिस्थितियों से जूझते हुए पृथ्वी पर अंतत: संदेश भेजने में कामयाब हो जाता है कि वह जिंदा है। वाटने का संदेश मिलने के बाद नासा के साथ दुनिया भर के वैज्ञानिक उसके क्रू के साथ एकजुट होते हैं, ताकि उससे संपर्क साधा जा सके, उसे वापस लाया जा सके।
मंगल से आएंगे ई-मेल? : आज की बात करें तो मंगल के दम जमा देने वाले ठंडे धरातल पर एक रोबोटीय संवेदक मंगल के महीन वातावरण से आंकड़े चुराकर दूर गर्त की खाक छान रहे रोवर को भेज देता है। रोवर बिना एक क्षण गंवाए मंगल की कक्षा में विराजमान उपग्रह को सारे आंकड़े सौंपता है। उपग्रह से होते हुए मंगल और पृथ्वी के बीच में स्थान-स्थान पर तैनात किए गए खोजी अंतरिक्ष यान इन आंकड़ों को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में मौजूद वैज्ञानिकों के साथ-साथ धरती पर भी भेज देंगे, और बात यदि 2025 की हो तो उपरोक्त प्रसारण लाइव हो जाएगा, ई-मेल के जरिये।
इंटरप्लेनेटरी इंटरनेट : फिर से सोच में पड़ गए आप कि एक और फंतासी संसार या मेट्रिक्स सरीखी फिल्म की कोई कहानी सुनाने में लगे हैं हम, लेकिन यह सच होने जा रहा है। वैज्ञानिकों ने इस संदेशवाहक तंत्र को इंटरप्लेनेटरी इंटरनेट (आईपीएन) नाम दिया है, जिसे हकीकत में उतारने के लिए विन्ट सर्फ- को डिजाइनर ऑफ टीसीपी/ आई पी प्रोटोकॉल, जिन्हें 'फादर ऑफ द इंटरनेट' भी कहा जाता है, एवं प्रोजेक्ट के मुखिया एड्रियन हुक जैसी महान हस्तियां प्रयासरत हैं। इसके लिए प्रयोग की गई तकनीक डिस्प्रेशन टोलरेंट नेटवर्किंग (डीटीएन) है। इंटरप्लेनेटरी इंटरनेट की रीढ़ के रूप में उपग्रहों के हब की एक विस्तृत श्रृंखला ग्रहों के ऊपर, उनकी कक्षा में, इधर से उधर जाने वाले अंतरिक्ष यानों आदि पर स्थापित की जाएगी। ये उपग्रह उच्च क्षमता वाला इंटरनेट ट्रैफिक मुहैया करवाएंगे, जिससे करोड़ों किलोमीटर की दूरी चंद पलों में सिमट जाएगी।
इंटरनेट एड्रेस निश्चित: शोधकर्ताओं ने सौरमंडल के सभी ग्रहों, उपग्रहों, कृत्रिम उपग्रहों, धूमकेतुओं, उल्कापिंडों, अंतरिक्ष स्टेशन एवं अंतरिक्ष यानों के इंटरनेट एड्रेस निश्चित कर दिए हैं। वैज्ञानिकों को आशा है कि वे इंटरप्लेनेटरी इंटरनेट से सुसज्जित सेटेलाइटों की एक श्रृंखला जल्द ही अंतरिक्ष में भेजने की शुरूआत कर देंगे। इसमें से कुछ मंगल की परिक्रमा भी करेंगे। फिलहाल एक ग्रह के लिए दो आईपीएन सैटेलाइट का प्रावधान किया जा रहा है।
रेस तो शुरू हो चुकी है: यह तो शोध और प्रयासों का एक पहलू है, इसके समानांतर हाल ही में गूगल और फीडिलिटी इन्वेस्टमेंट ने मिलकर केलिफोर्निया के एलन मस्क की कंपनी स्पेस एक्स्प्लोरेशन टेक्नोलाजीज कारपोरेशन उर्फ स्पेस एक्स को करीब 1 बिलियन डॉलर दिए हैं, ताकि अंतग्रहीय संचार के लिए उपयोगी बेव को हकीकत में उतारा जा सके।
मस्क पहले गूगल के ही एक वैज्ञानिक ग्रेग वीलर के साथ इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। अब वीलर अलग हो गए हैं और उनके ड्रीम प्रोजेक्ट वन बेव में वर्जिन ग्रुप और क्वालकॉम जैसे महारथी पैसा लगा रहे हैं। यह बात और है कि स्पेस एक्स अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन तक सामान ले जाने वाली पहले प्राइवेट कंपनी बन चुकी है। मकसद दोनों का एक ही है कि मंगल पर लोग अकेलापन कतई महसूस ना करें, वैसे ही सबसे और पृथ्वी से बातें कर सकें, जैसे कि आज अपने शहर में करते हैं ।
कैसा है मौजूदा सिस्टम : फिलहाल नासा अपने अंतरग्रहीय व धरती के नजदीक वाले अभियानों से डीप स्पेस नेटवर्क के जरिये संपर्क साधता है। मंगल ग्रह से सूचना के आदान प्रदान में साढ़े तीन मिनट से लेकर 20 मिनट का समय लगता है। इस नेटवर्क में केलिफोर्निया, स्पेन, ऑस्ट्रेलिया में डिश लगाई गई हैं, जो अंतरिक्ष यानों से संदेश प्राप्त करके उनसे संपर्क साधने में सहायता करती हैं, लेकिन, इस नेटवर्क की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह डिश और उपग्रह एक विशेष संपर्क रेखा में आने पर ही काम करते हैं। अर्थात् मंगल के रोवर की दिशा परिवर्तित करनी हो, अथवा चट्टान से बचाना हो या अंतरिक्ष यान को कुछ जानकारियां चाहिए हों तो उन्हें संपर्क रेखा में आने का इंतजार करना ही होगा, यदि सही समय पर सही दिशा में डीप स्पेस नेटवर्कर की डिश नहीं घूमीं तो संदेश अंतरिक्ष में हमेशा के लिए खो सकते हैं।
...तो होगा क्या? : और जब मंगल पर इंसान मौजूद हों, तो ऐसे खतरे कतई नहीं उठाए जा सकते हैं, इसीलिए इंसान के जाने के पहले ही सभी संभव कवायदों को उसकी मदद के लिए अमल में लाने की तैयारी है। भविष्य में यही सिस्टम दूसरे सौरमंडलों की यात्रा में भी काम आएंगे। इसके अंतर्गत आईपीएन ई-मेल की भांति काम करेगा, जहां पहले सूचनाएं एकत्र होंगीं, फिर वे सिस्टम के संबंधित हब को भेज दी जाएंगीं। यह नेटवर्क ग्रहों, अंतरिक्ष यानों व पृथ्वी के इंटरनेट से हमेशा संपर्क में रहेगा।
मंगल के किसी भी कोने से संदेश हब की एक व्यवस्थित श्रृंखला के माध्यम से हर वक्त धरती पर पहुंचते रहेंगे और मिनट दर मिनट धरती से आदेश भी प्राप्त करते रहेंगे। यही नहीं, आम इंटरनेट के जरिये अगर भेजे गए आंकड़े का प्राप्तकर्ता नहीं मिले तो वह फेल हो जाता है, लेकिन डीटीएन तकनीक के जरिये आंकड़े तब तक सुरक्षित रहेंगे, जब तक वह दूसरे पक्ष को प्राप्त न हो जाएं। बस इस तकनीक के जरिये अंतरग्रहीय संचार को अबाध जारी रखने के लिए मजबूत तकनीकी महारत की दरकार है। संचार में रुकावट, देरी तभी हो सकती है, जब अंतरिक्ष यान ग्रह के पीछे से होकर गुजरे या कोई ग्रहीय तूफान की स्थिति पैदा हो। इस दिशा में मंगल को भेजे गए रोवरों में कन्सलटेटिव कमेटी फॉर स्पेस डाटा सिस्टम प्रोटोकॉल्स भी लगाए गए हैं, जो इंटरप्लेनेटरी इंटरनेट का बुनियादी ढांचा तैयार करने में मदद करेंगे।
दुनिया का तो होगा भला : हालांकि, गूगल और वर्जिन जैसे निवेशकों के इस अंतग्रहीय संचार क्षेत्र में उतरने से एक और मकसद हल हो जाएगा और वह है दुनिया के हर कोने में बिना किसी परेशानी, बिना बफरिंग के इंटरनेट बिना किसी केबल आदि के सीधे मुहैया कराना। गांव, देहात ही नहीं, अंटाकर्टिका जैसे रिमोट स्टेशन और वीरान पहाड़ों पर भी लोगों को आपस में जोड़ना आसान हो जाएगा। शायद मंगल पर बस्तियां बसाने की होड़ में पृथ्वी का ही कुछ भला हो जाए।
सच कहूं तो मैंने प्रोजेक्ट के सिर्फ कुछ पहलू सामने रखे हैं, अन्य में हैरतअंगेज कारनामे भी हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इंटरप्लेनेटरी इंटरनेट नेटवर्क एक मोबाइल फोन सिस्टम भी जल्द ही उपलब्ध करा देगा और मंगल पर उपस्थित वैज्ञानिकों से आंखों देखा हाल टेलीविजन पर सुना जा सकेगा। तो इंतजार किस बात का, जरा चेक कर लीजिये, कहीं मंगल की खंदक में उपस्थित रिपोर्टर मि. एक्स आपके टेलीविजन पर माइक टेस्ट ना कर रहे ।

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