दलित, गाय, दादरी और कुत्ता जैसे मुद्दों ने निकाली मोदी के विजय रथ की हवा!
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नई दिल्ली। बिहार में जनता का फैसला आ चुका है और बिहार की जनता ने नीतीश कुमार की अगुवाई वाले महागठबंधन को प्रचंड बहुमत से जिताया है। इस चुनाव पर पूरे देश की नजर टिकी थीं। कहा जा रहा था कि ये चुनाव देश में राजनीति की दशा और दिशा तय करेगा।
चुनाव से पहले तक ये माना जा रहा था कि बीजेपी बिहार स्वीप करेगी जबकि चुनाव बाद कांटे की टक्कर की बात हो रही थी। आखिर क्यों हारी बीजेपी, कहां उससे चूक हुई? इसकी यूं तो कई वजह हैं, लेकिन सबसे पहले आपको दिखाते हैं कि चुनाव में विकास के मुद्दे से भटकना बीजेपी को कैसे भारी पड़ा।
बिहार में बीजेपी ने अपने सबसे ताकतवर नेता पीएम नरेंद्र मोदी की अगुवाई में चुनाव लड़ने का एलान किया और बीजेपी ने विकास को ही चुनावी एजेंडा बनाया, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव करीब आता गया। विकास का मुद्दा पीछे छूटता गया और दूसरे विवादास्पद मुद्दों ने विकास की जगह ले ली।
संघ प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण से जुड़ा एक बयान आया। कहा गया कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। फिर क्या था महागठबंधन के नेता खासकर लालू यादव ने उसे लपक लिया। हालांकि पीएम मोदी ने अपनी चुनावी रैली में आरक्षण को बचाने का आश्वासन दिया। उल्टा आरक्षण को लेकर महागठबंधन को घेरने की कोशिश की। दांव चला कि महागठबंधन के नेता दलितों का आरक्षण छीन कर दूसरे धर्म के लोगों को दे देंगे।
लेेकिन ये दांव भी बिहार के लोगों ने नकार दिया। ऊपर से हरियाणा में दलित परिवार को जलाने की घटना के बाद विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह के कुत्ता वाले बयान ने एनडीए की मुश्किलें और बढ़ा दीं। अपनी अंदरूनी रिपोर्टों में पिछड़ती दिख रही बीजेपी ने चुनावी रणनीति बदली।
इसी बीच लालू यादव का बीफ पर एक विवादास्पद बयान आया। जिसे लेकर बीजेपी नेताओं ने बीफ का मुद्दा बिहार में गर्मा दिया। ताबड़तोड़ लालू यादव और महागठबंधन पर हमले होने लगे। इस मुद्दे ने बिहार में बीजेपी के विकास के मुद्दे की हवा निकाल दी।
अभी बीफ का मुद्दा थमा भी नहीं था कि अमित शाह ने ये कह दिया कि अगर बीजेपी बिहार में हार गई तो पाकिस्तान में पटाखे फोड़े जाएंगे। इस बयान ने फिर बवाल खड़ा कर दिया। महागठबंधन ने इसे पूरे बिहार का अपमान बताया।
बढ़ती महंगाई और आसमान छूती दाल की कीमतों ने रही सही कसर पूरी कर दी। ऊपर से एनडीए नेताओं ने दाल की कीमतों के बढ़ने का ठीकरा उल्टा नीतीश सरकार पर फोड़ डाला। जो शायद जनता को हजम नहीं हुआ।
दाल, दलित, गाय, दादरी और कुत्ता जैसे तमाम मुद्दों पर तो सभी पार्टी के नेता बोलते दिखे, लेकिन असल मुद्दा यानी विकास कहीं पीछे छूट गया। लिहाजा जनता ने भी एनडीए को सीटों के मामले में बहुत पीछे छोड़ दिया।
चुनाव से पहले तक ये माना जा रहा था कि बीजेपी बिहार स्वीप करेगी जबकि चुनाव बाद कांटे की टक्कर की बात हो रही थी। आखिर क्यों हारी बीजेपी, कहां उससे चूक हुई? इसकी यूं तो कई वजह हैं, लेकिन सबसे पहले आपको दिखाते हैं कि चुनाव में विकास के मुद्दे से भटकना बीजेपी को कैसे भारी पड़ा।
बिहार में बीजेपी ने अपने सबसे ताकतवर नेता पीएम नरेंद्र मोदी की अगुवाई में चुनाव लड़ने का एलान किया और बीजेपी ने विकास को ही चुनावी एजेंडा बनाया, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव करीब आता गया। विकास का मुद्दा पीछे छूटता गया और दूसरे विवादास्पद मुद्दों ने विकास की जगह ले ली।
संघ प्रमुख मोहन भागवत का आरक्षण से जुड़ा एक बयान आया। कहा गया कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। फिर क्या था महागठबंधन के नेता खासकर लालू यादव ने उसे लपक लिया। हालांकि पीएम मोदी ने अपनी चुनावी रैली में आरक्षण को बचाने का आश्वासन दिया। उल्टा आरक्षण को लेकर महागठबंधन को घेरने की कोशिश की। दांव चला कि महागठबंधन के नेता दलितों का आरक्षण छीन कर दूसरे धर्म के लोगों को दे देंगे।
लेेकिन ये दांव भी बिहार के लोगों ने नकार दिया। ऊपर से हरियाणा में दलित परिवार को जलाने की घटना के बाद विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह के कुत्ता वाले बयान ने एनडीए की मुश्किलें और बढ़ा दीं। अपनी अंदरूनी रिपोर्टों में पिछड़ती दिख रही बीजेपी ने चुनावी रणनीति बदली।
इसी बीच लालू यादव का बीफ पर एक विवादास्पद बयान आया। जिसे लेकर बीजेपी नेताओं ने बीफ का मुद्दा बिहार में गर्मा दिया। ताबड़तोड़ लालू यादव और महागठबंधन पर हमले होने लगे। इस मुद्दे ने बिहार में बीजेपी के विकास के मुद्दे की हवा निकाल दी।
अभी बीफ का मुद्दा थमा भी नहीं था कि अमित शाह ने ये कह दिया कि अगर बीजेपी बिहार में हार गई तो पाकिस्तान में पटाखे फोड़े जाएंगे। इस बयान ने फिर बवाल खड़ा कर दिया। महागठबंधन ने इसे पूरे बिहार का अपमान बताया।
बढ़ती महंगाई और आसमान छूती दाल की कीमतों ने रही सही कसर पूरी कर दी। ऊपर से एनडीए नेताओं ने दाल की कीमतों के बढ़ने का ठीकरा उल्टा नीतीश सरकार पर फोड़ डाला। जो शायद जनता को हजम नहीं हुआ।
दाल, दलित, गाय, दादरी और कुत्ता जैसे तमाम मुद्दों पर तो सभी पार्टी के नेता बोलते दिखे, लेकिन असल मुद्दा यानी विकास कहीं पीछे छूट गया। लिहाजा जनता ने भी एनडीए को सीटों के मामले में बहुत पीछे छोड़ दिया।

