श्रीमद् भागवत कथा का हुआ आयोजन
https://husainijnp.blogspot.com/2015/11/blog-post_799.html
अजमी रिज़वी
बाराबंकी। नगर के मोहल्ला नेहरू नगर में श्रीमद् भागवत कथा आयोजन से
वातावरण कृष्णमय है। कथावाचक संत राजेश मिश्र शास्त्री के मुखारबिन्द से
हो रही अमृत वर्षा से हर कोई तृप्त होना चाहता है। धर्मभीरू महिलाआंे,
वरिष्ठ नागरिको की भीड़ कृछ ऐसा ही संदेश दे रही है। भागवत सप्ताह के
दूसरे दिन श्री शास्त्री ने कलयुग के आगमन की संगीतमयी प्रसंज्ञ सुनाकर
श्रोताओ का मन मोहा। उन्होंने राजा परीक्षित और कलयुग के मध्य वार्ता का
विस्तार से वर्णन किया। कलयुग ने जब राजा परीक्षित से उनके राज मे रहने
की अनुमति और स्थान मांगा तो उन्होंने कलयुग को वैश्यालयो और मदिरालयो
आदि में रहने की सहमति उसके स्वभाव अनुसार दी। कलयुग ने महाराज परीक्षित
से अपने निवेदन में कहा कि महाराज तमाम बुराईयों और कमियों के बाद भी
मुझमें अच्छाई खूबी भी है। सत्युग, त्रेता व द्वापर पर मुक्ति के लिए
तमाम त्याग तपस्या और यज्ञ करनी पड़ती है। मन में बुरा सोचने भर से पाप का
भागीदारी होना पड़ता है। लेकिन यह मेरा महात्म है कि मन में नेक विचार आने
भर से मानव पुण्य का भागी तो होगा, लेकिन बुरे विचार आने से उसे पाप नही
लगेगा। कलयुग में राम नाम जप मात्र करके मानव स्वर्ग का अधिकारी होगा।
संत श्री ने बोध कराया कि कोई कितना ही अवग्रुणी हो उसमे भी कुछ न कुछ
विशेषता होती है। कलयुग की विशेषता वाली नौका पर सवार होकर हमें प्रभू का
प्यार पाना चाहिए। गोस्वामी जी की चौपाई ‘‘कलयुग केवल नाम आधारा, सुमिरि
सुमिरि नर उतरहिं पारा‘‘ संगीतमयी प्रस्तुति कर उन्होंने उपस्थित
श्रोताओं का मन मोह लिया।
बाराबंकी। नगर के मोहल्ला नेहरू नगर में श्रीमद् भागवत कथा आयोजन से
वातावरण कृष्णमय है। कथावाचक संत राजेश मिश्र शास्त्री के मुखारबिन्द से
हो रही अमृत वर्षा से हर कोई तृप्त होना चाहता है। धर्मभीरू महिलाआंे,
वरिष्ठ नागरिको की भीड़ कृछ ऐसा ही संदेश दे रही है। भागवत सप्ताह के
दूसरे दिन श्री शास्त्री ने कलयुग के आगमन की संगीतमयी प्रसंज्ञ सुनाकर
श्रोताओ का मन मोहा। उन्होंने राजा परीक्षित और कलयुग के मध्य वार्ता का
विस्तार से वर्णन किया। कलयुग ने जब राजा परीक्षित से उनके राज मे रहने
की अनुमति और स्थान मांगा तो उन्होंने कलयुग को वैश्यालयो और मदिरालयो
आदि में रहने की सहमति उसके स्वभाव अनुसार दी। कलयुग ने महाराज परीक्षित
से अपने निवेदन में कहा कि महाराज तमाम बुराईयों और कमियों के बाद भी
मुझमें अच्छाई खूबी भी है। सत्युग, त्रेता व द्वापर पर मुक्ति के लिए
तमाम त्याग तपस्या और यज्ञ करनी पड़ती है। मन में बुरा सोचने भर से पाप का
भागीदारी होना पड़ता है। लेकिन यह मेरा महात्म है कि मन में नेक विचार आने
भर से मानव पुण्य का भागी तो होगा, लेकिन बुरे विचार आने से उसे पाप नही
लगेगा। कलयुग में राम नाम जप मात्र करके मानव स्वर्ग का अधिकारी होगा।
संत श्री ने बोध कराया कि कोई कितना ही अवग्रुणी हो उसमे भी कुछ न कुछ
विशेषता होती है। कलयुग की विशेषता वाली नौका पर सवार होकर हमें प्रभू का
प्यार पाना चाहिए। गोस्वामी जी की चौपाई ‘‘कलयुग केवल नाम आधारा, सुमिरि
सुमिरि नर उतरहिं पारा‘‘ संगीतमयी प्रस्तुति कर उन्होंने उपस्थित
श्रोताओं का मन मोह लिया।

