गुरुर से बचे, गुरूर सारी अच्छाइयों को खा जाता है-मौ0 मुराद रजा
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अजमी रिज़वी
बाराबंकी। जब तक जवानी दावे होते रहेंगे अमल में नही उतरेंगे मोआशरे में सुधार होने वाला नहीं यह बात मौलाना मुराद रजा साहब ने हाजी रईस के अजाखाने मे खम्से की तीसरी मजलिस को खिताब करते हुए कही मौलाना ने आगे कहा जो करते नही वो बोलते क्यों हो? अच्छे बन्दे की पहचान यह है कि वह अपना मोहासबा करता है यानी वह अपना हिसाब खुद करता रहे ताकि अल्लाह के यहा से जब हिसाब लिया जाय तो खतरा न हो। अल्लाह जमीन पर इतरा-इतरा के चलने वालो को पसन्द नही करता गुरूर से बचे गुरूर सारी अच्छाइयों को खा जाता है। अन्त में जनाबे अब्बास के दर्दनाक मसायब पेश किये जिसे सुनकर अजादार रो पड़े। मजलिस से पूर्व जफर अब्बास ने पढ़ा- एक रात सो के मरजिये कुदरत खरीद ली जरबत से दो जहां की इबादत खरीद ली। हसन मेहंदी ने पढ़ा नबी की आल से हमको अगर मोहब्बत है; हकीकतन यही खुशनूदिये रिसालत है। सरवर अली रिजवी ने पढ़ा हम बताये हक से क्या रिश्ता अबूतालिब का है; हक अली है और अली बेटा अबू तालिब का है। अजमी ने पढ़ा अली के लहजे मे जालिम से गुफ्तगू करके; रखा है लहजे का अपने हिजाब जैनब ने। मोनिस सरवर ने पढ़ा- तेरी बख्शिश है नवाजिस है करम है जैनब; तोहफये मातमे सरवर जो मिला है जैनब। बाद मजलिस अन्जुमन सदाये हुसैन ने नौहाख्वानी व सीनाजनी करते हुए पढ़ा- कैसे न निकले आख से आसू और होटो से हाय। नन्हे-नन्हे बच्चों ने भी नौहाख्वानी की अन्त में हाजी रईस ने सभी का शुक्रिया अदा किया।
