नबी की ज़ात ना होती तो यह कायनात न होती: मौलाना वसी हसन
https://husainijnp.blogspot.com/2015/12/blog-post_185.html
अजमी रिज़वी
बाराबंकी। पैग़म्बरे इस्लाम मोहम्मद मुस्तफा (स.अ.) और इमामे हसन (अ.) की शहादत पर ज़िले में कई कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। जिसमें मजलिस, मातम के साथ शब्बेदारी और जुलूस निकाले गये। कर्बला सिविल लाइन्स में अंजुमन पैग़ामे कर्बला के तत्वाधान में नाना नवासे का मातम शीर्षक से आयोजित इस कार्यक्रम में फैज़ाबाद से आये प्रोफ़ेसर वासी हसन खान साहब ने कहा की इताअत का नाम इस्लाम है। पैरवी का नाम दीन है। अगर नबी की ज़ात न होती तो यह क़ायनात न होती उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) के बेहतरीन किरदार और एखलाक की मिसालें दी। उन्होंने कहा दीन एखलाक से फैला लेकिन अफ़सोस आज दींने इस्लाम को मानने वाले मुसलमान सबसे बड़े बदएखलाक़ हैं। इस्लाम प्यार, मोहब्बत, हक़ सच्चाई, इंसाफ़पसन्दी ज़ुल्म के खिलाफ बोलने का नाम है। यह जो आज इस्लाम का रुख पेश किया जा रहा है यह ग़लत है। जो भी ज़ुल्म और ज़ालिम का साथ देते हैं वह न तो मुस्लमान हो सकतें हैं और न नबीये करीम के मानने वाले। अंत में पैग़म्बरे इस्लाम (स. अ.) और इमामे हसन के दर्दनाक मसायब पेश किये। जिसे सुनकर अज़ादार फफक फफक कर रो पड़े। मजलिस के बाद ताबूत मुबारक का जुलूस निकला जिसमें अंजुमन ज़ीनतुल अजा आलमपुर, अन्जुमन फरोगे अजा, देवरा सादात, अन्जुमन गुन्चए अब्बासिया, अन्जुमन गुलामे अस्करी, अन्जुमन पैगामे हुसैनी के साहबे बयाजो ने नोहाख्वानी व सीनाजनी की। मजलिस से पूर्व कशिश संडीलवी, बाक़र नक़वी, सरवर अली रिज़वी, ज़रगाम आलमपुरी, कामयाब, रज़ा मेहंदी ने पेशख्वानी की। मोहम्मद हैदर आबिदी ने हदीसे किसा से प्रोग्राम का आग़ाज़ किया। इससे पूर्व मसूद मंज़िल में आयोजित मजलिस में मुसव्विर ज़ैदपुरी और मोनिस सरवर ने पेश्ख्वानी की। वही मौलाना वसी हसन खां ने मजलिस को खिताब करते हुए कहा एख़लाक़ के साथ अमल करना कमाल नहीं बल्कि ख़ुलूस के साथ अमल को आखिरी वक्त तक बाक़ी रखना कमाल है। अल्लाह कुछ जानने वाला है उससे कुछ छिपा नहीं। वक्त अपने आप को गुनाह से बचाने की कोशिश करो। मजलिस की समाप्ति पर अन्जुमन गुलामे अस्करी ने नौहाख्वानी की। अंत में अयाज़ हैदर ज़ैदी ने सभी का शुक्रिया अदा किया।
बाराबंकी। पैग़म्बरे इस्लाम मोहम्मद मुस्तफा (स.अ.) और इमामे हसन (अ.) की शहादत पर ज़िले में कई कार्यक्रमों का आयोजन हुआ। जिसमें मजलिस, मातम के साथ शब्बेदारी और जुलूस निकाले गये। कर्बला सिविल लाइन्स में अंजुमन पैग़ामे कर्बला के तत्वाधान में नाना नवासे का मातम शीर्षक से आयोजित इस कार्यक्रम में फैज़ाबाद से आये प्रोफ़ेसर वासी हसन खान साहब ने कहा की इताअत का नाम इस्लाम है। पैरवी का नाम दीन है। अगर नबी की ज़ात न होती तो यह क़ायनात न होती उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) के बेहतरीन किरदार और एखलाक की मिसालें दी। उन्होंने कहा दीन एखलाक से फैला लेकिन अफ़सोस आज दींने इस्लाम को मानने वाले मुसलमान सबसे बड़े बदएखलाक़ हैं। इस्लाम प्यार, मोहब्बत, हक़ सच्चाई, इंसाफ़पसन्दी ज़ुल्म के खिलाफ बोलने का नाम है। यह जो आज इस्लाम का रुख पेश किया जा रहा है यह ग़लत है। जो भी ज़ुल्म और ज़ालिम का साथ देते हैं वह न तो मुस्लमान हो सकतें हैं और न नबीये करीम के मानने वाले। अंत में पैग़म्बरे इस्लाम (स. अ.) और इमामे हसन के दर्दनाक मसायब पेश किये। जिसे सुनकर अज़ादार फफक फफक कर रो पड़े। मजलिस के बाद ताबूत मुबारक का जुलूस निकला जिसमें अंजुमन ज़ीनतुल अजा आलमपुर, अन्जुमन फरोगे अजा, देवरा सादात, अन्जुमन गुन्चए अब्बासिया, अन्जुमन गुलामे अस्करी, अन्जुमन पैगामे हुसैनी के साहबे बयाजो ने नोहाख्वानी व सीनाजनी की। मजलिस से पूर्व कशिश संडीलवी, बाक़र नक़वी, सरवर अली रिज़वी, ज़रगाम आलमपुरी, कामयाब, रज़ा मेहंदी ने पेशख्वानी की। मोहम्मद हैदर आबिदी ने हदीसे किसा से प्रोग्राम का आग़ाज़ किया। इससे पूर्व मसूद मंज़िल में आयोजित मजलिस में मुसव्विर ज़ैदपुरी और मोनिस सरवर ने पेश्ख्वानी की। वही मौलाना वसी हसन खां ने मजलिस को खिताब करते हुए कहा एख़लाक़ के साथ अमल करना कमाल नहीं बल्कि ख़ुलूस के साथ अमल को आखिरी वक्त तक बाक़ी रखना कमाल है। अल्लाह कुछ जानने वाला है उससे कुछ छिपा नहीं। वक्त अपने आप को गुनाह से बचाने की कोशिश करो। मजलिस की समाप्ति पर अन्जुमन गुलामे अस्करी ने नौहाख्वानी की। अंत में अयाज़ हैदर ज़ैदी ने सभी का शुक्रिया अदा किया।
