पति के अभाव में किसी तरह बच्चों का पेट पाल रहीं लाचार माताएं
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जौनपुर। उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों की रहनुमाई करने वाली सत्तारूढ़ सपा सरकार के शासनकाल में भी इस वर्ग के गरीब परिवार के कुनबे सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं से पूरी तरह अछूते हैं। यह दृश्य केराकत तहसील क्षेत्र के मुफ्तीगंज विकास खण्ड अन्तर्गत ग्रामसभा कन्हौली (नरायनपुर) गांव में आसानी से देखा जा सकता है जहां लगभग 2 सौ की जनसंख्या में 15 अल्पसंख्यक परिवार हैं जो भूमिहीन हैं। आजादी के लगभग 65 साल बाद भी उनके जीविकोपार्जन से लेकर विकास हेतु कोई सरकारी ऐसी योजना नहीं है जिससे उनका कुनबा अपना व परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें की पूर्ति कर सके। इतना ही नहीं, पूरी तरह से भूमिहीन कुनबे के परिवारों को शासन द्वारा जारी होने वाले गरीबी रेखा के नीचे का राशन कार्ड भी उपलब्ध नहीं है।
पत्र-प्रतिनिधियों की टीम उक्त गांव में पहुंचकर जब नज्ब टटोली तो पता चला कि जैदुनिशा के पति जाहिद अली की मृत्यु हुये कई वर्ष हो गये लेकिन आज तक उसे विधवा पेंशन तो मिलना दूर, सरकार की किसी भी जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ तक नहीं मिला। पूरी तरह से भूमिहीन उक्त विधवा अपने 6 बच्चों में से 20 वर्षीय आसरीन की किसी तरह से शादी तो कर दी लेकिन नसरान 16 वर्ष कक्षा 10, आबिद अली 13 वर्ष कक्षा 8, नसरीन निशा कक्षा 8, मो. शाहिल 9 वर्ष कक्षा 5 और सबसे छोटी शाहीन 7 वर्ष कक्षा 2 का बोझ ढो रही है। इस सम्बन्ध में उसने बताया कि गरीबी के चलते बच्चों को पढ़ाना व उनके पेट की भूख मिटाना मेरे लिये किसी मौत को गले लगाने के समान है। आरोप है कि गांव के कोटेदार द्वारा 3 माह पूर्व खाद्य और रसद विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा जारी एक प्रिण्टेड राशन कार्ड दिया गया है लेकिन उस पर कोई भी राशन नहीं मिल रहा है। पूछने पर कोटेदार कहते हैं कि अभी इस पर कुछ भी नहीं मिलेगा। आरोप है कि सत्ता पक्ष से ताल्लुक रखने वाले कोटेदार जहां अधिकांश गरीब राशन कार्डधारकों का निवाला अपनी दबंगई से डकार जाते हैं, वहीं उनकी शिकायत नक्कारखाने में तूती की आवाज ही साबित होती है। बताया जाता है कि सत्ता से सम्बन्ध रखने के चलते प्रशासन के लोग भी इनकी शिकायतों पर कार्यवाही करने की बजाय मूकदर्शक बन जाते हैं। जिस विधवा के पास 1 इंच खेती योग्य भूमि नहीं है, उसके कार्ड में वार्षिक आय 36 हजार रूपये दिखा दी गयी है।
इसी गांव की एक विधवा सबुननिशा है जिसे आज तक विधवा पेंशन नसीब नहीं हो सका है। दो बच्चों में से एक सोनी 19 वर्ष की शादी हो चुकी है जबकि 20 साल का बेटा मो. युनुस बाहर रहकर मेहनत-मजदूरी करके किसी तरह परिवार की गाड़ी खींच रहा है। जीविकोपार्जन के लिये अन्य कोई साधन भी नहीं है। कार्ड के नाम पर एपीएल राशन कार्ड है जिस पर कभी-कभार राशन मिल पाता है। इसी गांव की सैबुनिशा पत्नी शौकत अली भी भूमिहीन है जो किसी तरह से मेहनत-मजदूरी करके अपने 5 बच्चों को पालने को मजबूर है लेकिन शासन की कोई भी योजना का लाभ इसे नहीं मिलता है। बाला पत्नी स्व. शाहिद पूरी तौर पर भूमिहीन है जो दो बच्चों की मां है जिसमें पुत्री शाहिबा 5 वर्ष और 6 वर्षीय एक पुत्र है। पति की मौत के बाद से ही वह मायके में रहकर अपने पिता के साथ सूई-धागा बेचकर किसी तरह पेट की भूख मिटा रही है। घोर गरीबी के चलते कभी-कभी भूखे पेट ही सोती है। राशन कार्ड और विधवा पेंशन भी नसीब नहीं है।
गांव का ही शमीउल्ला 50 वर्ष की पत्नी का एक वर्ष पहले मृत्यु हो गयी है जिसके चलते उसके ऊपर 5 बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी है। वह पूरी तरह से भूमिहीन है लेकिन सरकार की जनकल्याणकारी की एक भी योजना का लाभ उस तक नहीं पहुंच पा रहा है। सहीदुन 45 वर्ष पर पति फौजदार की मौत हो जाने पर उसके समक्ष 3 बच्चों की परवरिश का भार आ पड़ा है जबकि जीविकोपार्जन की दृष्टि से वह पूरी तरह से भूमिहीन है। एक बेटी हसीना की शादी किसी तरह से चंदा लगाकर कर दी गयी है लेकिन गरीबी रेखा का राशन कार्ड व विधवा पेंशन तक की सुविधा आज तक उसे नहीं मिल सकी है। इसी गांव की लालती 55 वर्ष के पति नन्हकू की 8 वर्ष पूर्व मृत्यु हो जाने से परिवार की परवरिश का भार उसके कंधों पर आ गया है। दो बच्चे शाहिद 12 वर्ष व बीरू 22 वर्ष हैं जिनमें बीरू दिमागी रूप से विक्षिप्त है। भूमिहीन होने, विधवा पेंशन आदि की सुविधा न मिलने से वह भीख मांगकर अपना व बच्चों का पेट पालने को मजबूर है। कुल मिलाकर इस गांव की गरीब व लाचार महिलाएं पति के अभाव में अपने बच्चों का पेट पालने के लिये मेहनत-मजदूरी कर रही हैं लेकिन सरकार की तरफ से कोई भी सुविधा से वे पूरी तरह से वंचित हैं।
इन गरीबों का कहना है कि चुनाव के समय लोग वोट मांगने के लिये आते हैं और आश्वासन देकर चले जाते हैं लेकिन फिर कभी नहीं आते हैं। पत्र-प्रतिनिधियों की टीम ने उन अल्पसंख्यक गरीबों की दीन-हीन दशा को करीब से जानने के लिये उक्त गांव का दौरा करके सच को जाना और करीब से देखकर उनकी पीड़ा को सुना। फिलहाल अब शासन-प्रशासन उन गरीबों के लिये क्या करता है, यह तो पूरी तरह से भविष्य के गर्भ में है।
पत्र-प्रतिनिधियों की टीम उक्त गांव में पहुंचकर जब नज्ब टटोली तो पता चला कि जैदुनिशा के पति जाहिद अली की मृत्यु हुये कई वर्ष हो गये लेकिन आज तक उसे विधवा पेंशन तो मिलना दूर, सरकार की किसी भी जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ तक नहीं मिला। पूरी तरह से भूमिहीन उक्त विधवा अपने 6 बच्चों में से 20 वर्षीय आसरीन की किसी तरह से शादी तो कर दी लेकिन नसरान 16 वर्ष कक्षा 10, आबिद अली 13 वर्ष कक्षा 8, नसरीन निशा कक्षा 8, मो. शाहिल 9 वर्ष कक्षा 5 और सबसे छोटी शाहीन 7 वर्ष कक्षा 2 का बोझ ढो रही है। इस सम्बन्ध में उसने बताया कि गरीबी के चलते बच्चों को पढ़ाना व उनके पेट की भूख मिटाना मेरे लिये किसी मौत को गले लगाने के समान है। आरोप है कि गांव के कोटेदार द्वारा 3 माह पूर्व खाद्य और रसद विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा जारी एक प्रिण्टेड राशन कार्ड दिया गया है लेकिन उस पर कोई भी राशन नहीं मिल रहा है। पूछने पर कोटेदार कहते हैं कि अभी इस पर कुछ भी नहीं मिलेगा। आरोप है कि सत्ता पक्ष से ताल्लुक रखने वाले कोटेदार जहां अधिकांश गरीब राशन कार्डधारकों का निवाला अपनी दबंगई से डकार जाते हैं, वहीं उनकी शिकायत नक्कारखाने में तूती की आवाज ही साबित होती है। बताया जाता है कि सत्ता से सम्बन्ध रखने के चलते प्रशासन के लोग भी इनकी शिकायतों पर कार्यवाही करने की बजाय मूकदर्शक बन जाते हैं। जिस विधवा के पास 1 इंच खेती योग्य भूमि नहीं है, उसके कार्ड में वार्षिक आय 36 हजार रूपये दिखा दी गयी है।
इसी गांव की एक विधवा सबुननिशा है जिसे आज तक विधवा पेंशन नसीब नहीं हो सका है। दो बच्चों में से एक सोनी 19 वर्ष की शादी हो चुकी है जबकि 20 साल का बेटा मो. युनुस बाहर रहकर मेहनत-मजदूरी करके किसी तरह परिवार की गाड़ी खींच रहा है। जीविकोपार्जन के लिये अन्य कोई साधन भी नहीं है। कार्ड के नाम पर एपीएल राशन कार्ड है जिस पर कभी-कभार राशन मिल पाता है। इसी गांव की सैबुनिशा पत्नी शौकत अली भी भूमिहीन है जो किसी तरह से मेहनत-मजदूरी करके अपने 5 बच्चों को पालने को मजबूर है लेकिन शासन की कोई भी योजना का लाभ इसे नहीं मिलता है। बाला पत्नी स्व. शाहिद पूरी तौर पर भूमिहीन है जो दो बच्चों की मां है जिसमें पुत्री शाहिबा 5 वर्ष और 6 वर्षीय एक पुत्र है। पति की मौत के बाद से ही वह मायके में रहकर अपने पिता के साथ सूई-धागा बेचकर किसी तरह पेट की भूख मिटा रही है। घोर गरीबी के चलते कभी-कभी भूखे पेट ही सोती है। राशन कार्ड और विधवा पेंशन भी नसीब नहीं है।
गांव का ही शमीउल्ला 50 वर्ष की पत्नी का एक वर्ष पहले मृत्यु हो गयी है जिसके चलते उसके ऊपर 5 बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी है। वह पूरी तरह से भूमिहीन है लेकिन सरकार की जनकल्याणकारी की एक भी योजना का लाभ उस तक नहीं पहुंच पा रहा है। सहीदुन 45 वर्ष पर पति फौजदार की मौत हो जाने पर उसके समक्ष 3 बच्चों की परवरिश का भार आ पड़ा है जबकि जीविकोपार्जन की दृष्टि से वह पूरी तरह से भूमिहीन है। एक बेटी हसीना की शादी किसी तरह से चंदा लगाकर कर दी गयी है लेकिन गरीबी रेखा का राशन कार्ड व विधवा पेंशन तक की सुविधा आज तक उसे नहीं मिल सकी है। इसी गांव की लालती 55 वर्ष के पति नन्हकू की 8 वर्ष पूर्व मृत्यु हो जाने से परिवार की परवरिश का भार उसके कंधों पर आ गया है। दो बच्चे शाहिद 12 वर्ष व बीरू 22 वर्ष हैं जिनमें बीरू दिमागी रूप से विक्षिप्त है। भूमिहीन होने, विधवा पेंशन आदि की सुविधा न मिलने से वह भीख मांगकर अपना व बच्चों का पेट पालने को मजबूर है। कुल मिलाकर इस गांव की गरीब व लाचार महिलाएं पति के अभाव में अपने बच्चों का पेट पालने के लिये मेहनत-मजदूरी कर रही हैं लेकिन सरकार की तरफ से कोई भी सुविधा से वे पूरी तरह से वंचित हैं।
इन गरीबों का कहना है कि चुनाव के समय लोग वोट मांगने के लिये आते हैं और आश्वासन देकर चले जाते हैं लेकिन फिर कभी नहीं आते हैं। पत्र-प्रतिनिधियों की टीम ने उन अल्पसंख्यक गरीबों की दीन-हीन दशा को करीब से जानने के लिये उक्त गांव का दौरा करके सच को जाना और करीब से देखकर उनकी पीड़ा को सुना। फिलहाल अब शासन-प्रशासन उन गरीबों के लिये क्या करता है, यह तो पूरी तरह से भविष्य के गर्भ में है।

