जरी कारीगरों की दशा दिन प्रतिदिन बद से बद्तर होती जा रही है
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अजमी रिज़वी
बाराबंकी। शासन के उपेक्षा पूर्ण रवैय्ये के चलते जरी का कार्य करने वाले बेहतरीन कारीगारों की दशा दिन प्रतिदिन बद से बद्तर होती चली जा रही है। यदि इनकी इस गिरती हुई दशा की ओर सरकार थोड़ा ध्यान दे दे तो इनके इस धन्धे में चार चांद लग जायें। क्षेत्र के बदोसरायं, मरकामऊ, मेलारायगंज, रामपुर, किन्तूर, सैदनपुर, सहादतगंज, दरियाबाद जैसे विभिन्न गांवों के हजारों की संख्या में जरी के कारीगर जरी का कार्य करके अपनी आजीविका को चलाते हैं। इन्हे वर्ष में बमुश्किल 5 महीने ही कार्य मिल पाता है। शेष 7 महीने इन्हे बेरोजगारी का देश झेलना पड़ता है। यह जरी के कारीगर लखनऊ के बड़े व्यापारियों के यहां से जरी का काम ला करके सिलते हैं। इन्हे समय पर पैसा भी नही मिल पाता है। इसके सम्बन्ध में जरी का कार्य करने वाले ़बदोसरायं निवासी इरफान बताते हैं कि लखनऊ से बडे व्यापारियों से उन्हे जरी की कारीगरी करने के लिए काम लाना पड़ता है। समय से पैसा भी नही मिल पाता है। एक सूट तैयार करने में 3 दिन लग जाते हैं। 500 रुपये का मैटेरियल लग जाता है। 3 कारीगर 150 रुपये की नफरी पर सिलते हैं। 1300 रुपये ही एक सूट पर मिलते हैं। किराया निकाल करके कारीगरी के अतिरिक्त कुछ भी नही मिल पाता है। अरमान निवासी मुश्काबाद बताते हैं कि साल में सिर्फ 5 महीने ही जरी का काम चलता है। शेष 7 महीने जरी के कारीगर बेरोजगारी का दंश झेलते हैं। जरी के कार्य में फायदा कम जोखिम अधिक धारण करना पड़ता है। यदि जरा सा सूट अल्टर हो जाता है। तो उसका खामियाजा करखनदार को भुगतना पड़ता है। तो वहीं सलमान अहमद बताते हैं कि यदि सरकार इन जरी की कारीगरी की ओर थोड़ा ध्यान दे दे तो इनका कल संवर सकता है। इसके लिए सरकार को चाहिये की ब्लाक स्तर से कम से कम एक ऐसा सेन्टर खोलवा दे। जहां पर समय से इन्हे काम व मजदूरी मिल सके। साथ ही साथ बेरोजगारी के दंश से इन्हे निजात मिले। इन्हे अपने कार्य के लिए बड़े व्यापारियों का मुॅह न ताकना पड़े तो वहीं कस्बा बदोसरायं निवासी जरी के कारीगर सनाउल हक ने बताया कि इस धन्धें कोई विशेष फायदा नही रह गया है। क्योंकि समय पर कार्य नही मिल पाता है। समय पर यदि कार्य मिल गया तो पैसा समय पर नही मिलता है। यह कार्य एक आदमी के बस का नही है।एक सूट को तैयार करने के लिए जहां कई कारीगरों की आवश्यकता होती है। तो वहीं लागत के हिसाब से मुनाफा नही मिल पाता है। केवल कारीगरी का ही पैसा बचता है। फिर भी क्या किया जाये आजीविका चलाने के लिए कुछ न कुछ करना ही पड़ता है। यदि सरकार इन जरी का कार्य करने वाले कारीगरों की समस्या की ओर थोड़ा ध्यान दे दे तो इनके इस धन्धे में चार चांद लग जायें और इन्हे बेकारी का दंश न झेलना पड़े। सरकार को चाहिये की ब्लाक स्तर पर ऐसे केन्दों को खोलवा दे जहां इन्हे आसानी से जरी का कार्य व मजदूरी मिल जाये।

