एमएलसी चुनाव में त्रिकोणीय संर्घष में फसा कैडर प्रत्याशी
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अजमी रिज़वी / आसिफ हुसैन / मनीष सिंह
बाराबंकी। जनपद की राजनीति में पिछड़ो का वर्चस्व कम होता जा रहा है। प्रदेश की सत्ता में आने के बाद पिछड़ो की राजनीति करने वाली सपा सरकार सवर्णों और मुसलमानों की हितैशी बन गयी है। हाल ही में हुये पंचायत चुनाव में जिस प्रकार सपा समर्थित प्रत्याशियों में पिछड़ों की उपेक्षा करते हुए अन्य लोगों को मौका दिया गया इससे समाजवादी पार्टी के स्वजातीय नेताओं में हताशा देखने को मिली। बताते चलें कि पंचायत चुनाव में पन्द्रह विकास खण्डो के ब्लाक प्रमुखों में सपा ने चौदह सीटों पर बाजी मारी। वहीं एक सीट पर बसपा के क्षत्रिय प्रत्याशी को भी र्निविरोध सफलता मिली। ऐसे में सपा के जुझारु नेताओं की मेहनत के बदौलत सपा के तीन व बसपा के एक क्षत्रिय उम्मीदवार को ब्लाक प्रमुख चुना गया। जबकि सपा के शिल्पकार यादव समाज से मात्र दो प्रत्याशियों को ही सफलता हासिल ही हुई। जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में भी क्षत्रिय समाज का जलवा रहा। सपा के कद्दावर नेताओं में शुमार सपा का स्वाभिमान कहे जाने वाले कैबिनेट मंत्री ने अपने भाई को र्निविरोध जिला पंचायत का अध्यक्ष बनाया। ऐसे में सदस्य विधान परिषद के लिये समाजवादी पार्टी का कैडर प्रत्याशी मैदान में उतरा तो उसे मुंह की खानी पड़ी। इसका कारण यह भी रहा कि जिले में बढ़ रही सामंतवादी व्यवस्था समाजवादी व्यवस्था पर हावी होती नजर आयी। सपा द्वारा र्निविरोध प्रत्याशियों को जिताने की परम्परा एमएलसी चुनाव पर आकर रुक गयी। जिसका कारण शायद सपा के कैडर प्रत्याशी को एमएलसी का टिकट दिया जाना रहा। मुख्यमंत्री का करीबी होने के बाद भी एमएलसी चुनाव में र्निविरोध चुनाव न जिता पाना कहीं न कहीं यह संदेश दे रहा है कि सपाईयों में कैडर प्रत्याशी को लेकर एकजुटता नही बन पायी। यदि एमएलसी प्रत्याशी कैडर प्रत्याशी के अलावा अन्य कोई होता तो शायद यह सीट भी सपा र्निविरोध जीत सकती थी। ऐसे में सपा के एमएलसी प्रत्याशी को र्निविरोध न जिताने का मलाल अब सपाईयों के चेहरों पर साफ नजर आ रहा है। लेकिन फिर भी संगठन में एकजुटता की कमी नजर आ रही है। टिकट की पैरोकारी में लगे समाजवादी पुरोधा रामसेवक यादव के परिजनों को एमएलसी का टिकट न दिये जाने से नाराज यादव गुट आज भी सपा के घोषित उम्मीदवार के विरोध में खड़ा है। जबकि ऐसे ही कई और गुट हैं जो यह नही चाहते हैं कि सपा का उम्मीदवार एमएलसी चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करे। विधान परिषद के चुनाव आते-आते स्थिति अब यह हो गयी है कि सपा प्रत्याशी को विधान परिषद पहुंचाने में पूरा संगठन एकजुट होकर मतदाताओं को रिझाने में लगे हुये हैं। सपा के अलावा बसपा और फिर भाकियू नेता को भाजपा का समर्थन मिलने के बाद एमएलसी का चुनाव अब और भी रोचक और दिलचस्प हो गया है। ऐसे में सपा के विभीषण कहे जाने वाले नेता क्या अपनी रणनीति को कारगार साबित कर पायेंगे ? यह तो चुनाव का परिणाम ही बतायेगा लेकिन चुनाव में सपा की भूमिका आज भी अपने कैडर कार्यकर्ताओं के साथ मजबूती से प्रचार प्रसार कर रही है। जोकि विपक्षियों के हौसले को पस्त करने में काफी है।
बाराबंकी। जनपद की राजनीति में पिछड़ो का वर्चस्व कम होता जा रहा है। प्रदेश की सत्ता में आने के बाद पिछड़ो की राजनीति करने वाली सपा सरकार सवर्णों और मुसलमानों की हितैशी बन गयी है। हाल ही में हुये पंचायत चुनाव में जिस प्रकार सपा समर्थित प्रत्याशियों में पिछड़ों की उपेक्षा करते हुए अन्य लोगों को मौका दिया गया इससे समाजवादी पार्टी के स्वजातीय नेताओं में हताशा देखने को मिली। बताते चलें कि पंचायत चुनाव में पन्द्रह विकास खण्डो के ब्लाक प्रमुखों में सपा ने चौदह सीटों पर बाजी मारी। वहीं एक सीट पर बसपा के क्षत्रिय प्रत्याशी को भी र्निविरोध सफलता मिली। ऐसे में सपा के जुझारु नेताओं की मेहनत के बदौलत सपा के तीन व बसपा के एक क्षत्रिय उम्मीदवार को ब्लाक प्रमुख चुना गया। जबकि सपा के शिल्पकार यादव समाज से मात्र दो प्रत्याशियों को ही सफलता हासिल ही हुई। जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में भी क्षत्रिय समाज का जलवा रहा। सपा के कद्दावर नेताओं में शुमार सपा का स्वाभिमान कहे जाने वाले कैबिनेट मंत्री ने अपने भाई को र्निविरोध जिला पंचायत का अध्यक्ष बनाया। ऐसे में सदस्य विधान परिषद के लिये समाजवादी पार्टी का कैडर प्रत्याशी मैदान में उतरा तो उसे मुंह की खानी पड़ी। इसका कारण यह भी रहा कि जिले में बढ़ रही सामंतवादी व्यवस्था समाजवादी व्यवस्था पर हावी होती नजर आयी। सपा द्वारा र्निविरोध प्रत्याशियों को जिताने की परम्परा एमएलसी चुनाव पर आकर रुक गयी। जिसका कारण शायद सपा के कैडर प्रत्याशी को एमएलसी का टिकट दिया जाना रहा। मुख्यमंत्री का करीबी होने के बाद भी एमएलसी चुनाव में र्निविरोध चुनाव न जिता पाना कहीं न कहीं यह संदेश दे रहा है कि सपाईयों में कैडर प्रत्याशी को लेकर एकजुटता नही बन पायी। यदि एमएलसी प्रत्याशी कैडर प्रत्याशी के अलावा अन्य कोई होता तो शायद यह सीट भी सपा र्निविरोध जीत सकती थी। ऐसे में सपा के एमएलसी प्रत्याशी को र्निविरोध न जिताने का मलाल अब सपाईयों के चेहरों पर साफ नजर आ रहा है। लेकिन फिर भी संगठन में एकजुटता की कमी नजर आ रही है। टिकट की पैरोकारी में लगे समाजवादी पुरोधा रामसेवक यादव के परिजनों को एमएलसी का टिकट न दिये जाने से नाराज यादव गुट आज भी सपा के घोषित उम्मीदवार के विरोध में खड़ा है। जबकि ऐसे ही कई और गुट हैं जो यह नही चाहते हैं कि सपा का उम्मीदवार एमएलसी चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करे। विधान परिषद के चुनाव आते-आते स्थिति अब यह हो गयी है कि सपा प्रत्याशी को विधान परिषद पहुंचाने में पूरा संगठन एकजुट होकर मतदाताओं को रिझाने में लगे हुये हैं। सपा के अलावा बसपा और फिर भाकियू नेता को भाजपा का समर्थन मिलने के बाद एमएलसी का चुनाव अब और भी रोचक और दिलचस्प हो गया है। ऐसे में सपा के विभीषण कहे जाने वाले नेता क्या अपनी रणनीति को कारगार साबित कर पायेंगे ? यह तो चुनाव का परिणाम ही बतायेगा लेकिन चुनाव में सपा की भूमिका आज भी अपने कैडर कार्यकर्ताओं के साथ मजबूती से प्रचार प्रसार कर रही है। जोकि विपक्षियों के हौसले को पस्त करने में काफी है।

