स्लीपर फैक्ट्री पर हाईकोर्ट का कड़ा रुख
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अजमी रिज़वी
बाराबंकी। भले ही बुढवल रेलवे स्टेशन स्थित पाटिल रेल इन्फ्रास्ट्रक्चर कम्पनी से रेलवे को सप्लाई होने वाले स्लीपरो की गुणवत्ता पर सवाल उठकर समाचार पत्रों में सुर्खिया पाती रही है। लेकिन भारत के विकास की रेल में अहम आलाधिकारियों के जिम्मेदार न साबित होने के बावजूद माननीय उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका पर संज्ञान लेकर दो सप्ताह में जबाब मांग लिया है। मालूम हो कि पाटिल रेल इन्फ्रास्ट्रक्चर कम्पनी बुढवल के प्रबन्धक सुरजीत दत्ता चौधरी ने कैसियर और सहायक पर 10 लाख रूपया गबन करने का मामला थाना रामनगर में दर्ज कराया था। वहीं आरोपी परिजनो की ओर से सीओ को दिये गये पत्र मे लगाये गये गम्भीर आरोपों पर शुरू हुई जांच में स्लीपरो की गुणवत्ता पर भ्रष्टाचार की काली छाया परत दर परत निकलकर सामने आने भी लगी थी। मिली जानकारी के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे पुलिस ने छापा मारकर एफडीएन पाउडर की हजारो बोरियां एक गोदाम में बरामद भी की थी। हालाकिं कोई कार्यवाही परवान चढ पाती उससे पहले तत्कालीन सीओ डा. राजेश तिवारी स्थानान्तरित हो गये। प्राप्त विवरण के अनुसार वर्ष 2013 के अप्रैल माह से मार्च 2014 तक की बात ही ले लीजिए। स्लीपरो के निर्माण पर कनप्लास्ट पाउडर का उपयोग रेलवे के निर्देशो के तहत मिक्स डिजाइन के अनुसार 1 लाख 64 हजार किलो ग्राम निश्चित होने के बावजूद 27 हजार 430 किग्रा. उपयोग किया गया। इस तरह 1 लाख 37 हजार 85 किग्रा. कनप्लास्ट पाउडर का रिकार्ड क्या हुआ क्या इसके स्थान पर चाइना निर्मित एफडीएन पाउडर का ही प्रयोग किया गया। जो कनप्लास्ट पाउडर की अपेक्षा काफी सस्ता और घटिया होकर मानक के विपरीत बताया जाता है। इस अवधि में रेलवे ने कितने स्लीपरों की कम्पनी से खरीददारी की। बहरहाल तत्कालीन सीओ की चाहत के बावजूद थानाध्यक्ष पंकज कुमार सिंह ने लोगो की सुरक्षा से जुडे इस अहम मुद्दे का मामला पंजीकृत किया जाना मुनासिब न समझा। जबकि यह मामला समाचार पत्रों की सुर्खियों में छाया रहा। सीओ का तबादला और कम्पनी प्रबन्ध तंत्र के हौसले बुलन्द होने के साथ बरामद एफडीएन पाउडर का मामला ठण्डे बस्ते में चला गया। इस पूरे प्रकरण में जानकारों के अनुसार सबसे अहम बात तो यह रही कि अप्रैल 2015 में पुलिस ने गबन के मामले में अन्तिम रिर्पोट लगाते हुये आरोपियों को दोष मुक्त करार दिया। जनहित के मद्देनजर ग्राम तेलवारी निवासी ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह की 2061 एमबीपीआईएल पर संज्ञान लेते हुये माननीय उच्च न्यायालय लखनऊ ने दो सप्ताह में जिम्मेदारों से जबाब मंागा है।
बाराबंकी। भले ही बुढवल रेलवे स्टेशन स्थित पाटिल रेल इन्फ्रास्ट्रक्चर कम्पनी से रेलवे को सप्लाई होने वाले स्लीपरो की गुणवत्ता पर सवाल उठकर समाचार पत्रों में सुर्खिया पाती रही है। लेकिन भारत के विकास की रेल में अहम आलाधिकारियों के जिम्मेदार न साबित होने के बावजूद माननीय उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका पर संज्ञान लेकर दो सप्ताह में जबाब मांग लिया है। मालूम हो कि पाटिल रेल इन्फ्रास्ट्रक्चर कम्पनी बुढवल के प्रबन्धक सुरजीत दत्ता चौधरी ने कैसियर और सहायक पर 10 लाख रूपया गबन करने का मामला थाना रामनगर में दर्ज कराया था। वहीं आरोपी परिजनो की ओर से सीओ को दिये गये पत्र मे लगाये गये गम्भीर आरोपों पर शुरू हुई जांच में स्लीपरो की गुणवत्ता पर भ्रष्टाचार की काली छाया परत दर परत निकलकर सामने आने भी लगी थी। मिली जानकारी के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे पुलिस ने छापा मारकर एफडीएन पाउडर की हजारो बोरियां एक गोदाम में बरामद भी की थी। हालाकिं कोई कार्यवाही परवान चढ पाती उससे पहले तत्कालीन सीओ डा. राजेश तिवारी स्थानान्तरित हो गये। प्राप्त विवरण के अनुसार वर्ष 2013 के अप्रैल माह से मार्च 2014 तक की बात ही ले लीजिए। स्लीपरो के निर्माण पर कनप्लास्ट पाउडर का उपयोग रेलवे के निर्देशो के तहत मिक्स डिजाइन के अनुसार 1 लाख 64 हजार किलो ग्राम निश्चित होने के बावजूद 27 हजार 430 किग्रा. उपयोग किया गया। इस तरह 1 लाख 37 हजार 85 किग्रा. कनप्लास्ट पाउडर का रिकार्ड क्या हुआ क्या इसके स्थान पर चाइना निर्मित एफडीएन पाउडर का ही प्रयोग किया गया। जो कनप्लास्ट पाउडर की अपेक्षा काफी सस्ता और घटिया होकर मानक के विपरीत बताया जाता है। इस अवधि में रेलवे ने कितने स्लीपरों की कम्पनी से खरीददारी की। बहरहाल तत्कालीन सीओ की चाहत के बावजूद थानाध्यक्ष पंकज कुमार सिंह ने लोगो की सुरक्षा से जुडे इस अहम मुद्दे का मामला पंजीकृत किया जाना मुनासिब न समझा। जबकि यह मामला समाचार पत्रों की सुर्खियों में छाया रहा। सीओ का तबादला और कम्पनी प्रबन्ध तंत्र के हौसले बुलन्द होने के साथ बरामद एफडीएन पाउडर का मामला ठण्डे बस्ते में चला गया। इस पूरे प्रकरण में जानकारों के अनुसार सबसे अहम बात तो यह रही कि अप्रैल 2015 में पुलिस ने गबन के मामले में अन्तिम रिर्पोट लगाते हुये आरोपियों को दोष मुक्त करार दिया। जनहित के मद्देनजर ग्राम तेलवारी निवासी ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह की 2061 एमबीपीआईएल पर संज्ञान लेते हुये माननीय उच्च न्यायालय लखनऊ ने दो सप्ताह में जिम्मेदारों से जबाब मंागा है।

