नशेड़ी डाक्टर को बचा रहे सीएमओ !
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अजमी रिज़वी
बाराबंकी। मुख्य चिकित्साधिकारी की कार्यशैली उन्हे विवादों से घेरती जा
रही है। स्वास्थ्य विभाग में तैनात डाक्टर मानवता को तार-तार कर रहे हैं
और ऐसे डाक्टरों को मुख्य चिकित्साधिकारी संरक्षण देकर उनका हौसला आफजाई
किया जा रहा है और पीड़ित न्याय पाने के लिये अधिकारियों के यहां चक्कर
लगा रहा है।
गौरतलब है कि बीते 17 नवम्बर 2015 की रात्रि में लावारिश नवजात बालिका
को अस्पताल में भर्ती कराने के दौरान नशे में धुत डाक्टर एसके सिंह ने
जहां लावारिश को फेंकने का प्रयास किया गया था, वहीं भर्ती कराने गये
चाइल्ड लाइन जिला उपकेन्द्र के निदेशक रत्नेश कुमार के साथ मारपीट कर
अस्पताल से बाहर किया गया था। यह घटना मीडिया की सुर्खियों में आने के
बाद और पीड़ित द्वारा शिकायत करने पर जांच कर कार्यवाही के लिये बाल न्याय
पीठ, राज्यपाल संरक्षण आयोग सहित जिलाधिकारी ने सीएमओ को आदेश दिया था।
जिस पर सीएमओ डा. रवीन्द्र पोरवाल ने जांच अधिकारी अपर मुख्य
चिकित्साधिकारी डा आईपी वर्मा को बनाया और तीन महीने बाद सीएमओं ने जांच
कर रिपोर्ट जो जिलाधिकारी को प्रेषित की गयी उससे हर एक नागरिक सीएमओं की
कार्यशैली पर उंगली उठा रहा है। सीएमओं ने अपनी जांच रिपोर्ट में यह कहकर
के डाक्टर को बचाने का प्रयास किया कि शिकायतकर्ता रत्नेश कुमार से कई
बार अपना पक्ष रखने के लिये कहा गया। लेकिन वह अपना पक्ष रखने नही आये।
जिससे यह जांच चलने योग्य नही है और जब यह पूछा गया उनसे कि किस माध्यम
से और कैसे सूचना दी गयी तो कोई माकूल जवाब नही दे पाये। वहीं पीड़ित
रत्नेश कुमार का कहना है कि कोई भी बच्चा किसी प्रकार के संकट में होने
पर चाइल्ड लाइन द्वारा दो मिनट के अंदर बच्चे के बारे में सूचना प्राप्त
होती हैं। वहीं जिला अस्पताल के जिला महिला एवं पुरुष अस्पताल के
डाक्टरों व मुख्य चिकित्सा अधीक्षकों से प्रायः दिन में एक दो बार
मुलाकात होती है और मुझे अपना पक्ष रखने के लिये किसी भी चिकित्सा
अधीक्षक व जांच अधिकारी द्वारा नही कहा गया और न ही बुलाया गया। सीएमओं
के द्वारा लगायी गयी रिपोर्ट में दोषी डाक्टर को पूरी तरह से बचाने का
प्रयास किया गया है।

