यहां लाशों को छोड़ देते हैं अधजला !
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पोर्ट मोरिसबे। अब भी दुनिया के बड़े हिस्से से शायद हम सब अंजान हैं। अगर आपको लगता है कि आधुनिक दुनिया के बारे में हमें सबकुछ पता है, तो शायद ये हमारी और आपकी सबसे बड़ी भूल है। क्या आपने कभी ऐसे कबीले के बारे में सुना है, जो अपने लोगों की लाशें न तो पूरी तरह से जलाते हैं, न ही दफनाते हैं? ये कबीला लातिन अमेरिकी देश पापुआ न्यू गिनी में है। ये देश ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप से सटा हुआ है, तो एशिया से भी। पर है सबसे अलग।
यहां ऐसी जनजातियां निवास करती हैं, जिनका आम दुनिया से कोई खास लेना देना नहीं। और तो और, यहां की परंपराएं भी बेहद अजीब हैं। ऐसी ही अंतिम संस्कार की एक अजीब परंपरा है यहां की असेकी जनजाति में। असेकी जनजाति के लोग अपने प्रियजनों की मौत के बाद उनका शव बांस के पट्टियों पर बैठाकर उन्हें आखिरी विदाई देते हैं। पर बांस की पट्टियां जल्दी जल जाती हैं, वहीं शव अधजले रह जाते हैं। पर ये जनजाति उस अधजले शव को दफनाती नहीं है, न ही उन्हें दुबारा आग के हवाले करती हैं, बल्कि उन्हें वहीं पर छोड़ देती हैं।
असेकी जनजाति का ऐसा करने के पीछे जो परंपरा है, वो है शरीर का पंचतत्व में मिलना। आग के माध्यम से शरीर के जरूरी हिस्से आग और हवा में मिल जाते हैं, तो बाकी का हिस्सा धीरे धीरे अपना आकार खोता है। और फिर वो तबतक वहां रहता है, जबतक समंदर की लहरें या बारिश का पानी उन्हें पूरी तरह से नष्ट न कर दें। वैसे, इस जनजाति के लोग इसाई धर्म को मानने लगे हैं। यहां सबसे पहले 1910 के दशक में इसाईयों का समूह पहुंचा था, जिन्होंने उनका धर्मांतरण कराया। पर ये प्रथा सदियों से बदस्तूर चली ही आ रही है। इस प्रथा के बारे में हाल ही में लोगों ने तब जाना, जब इसपर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई गई।
यहां ऐसी जनजातियां निवास करती हैं, जिनका आम दुनिया से कोई खास लेना देना नहीं। और तो और, यहां की परंपराएं भी बेहद अजीब हैं। ऐसी ही अंतिम संस्कार की एक अजीब परंपरा है यहां की असेकी जनजाति में। असेकी जनजाति के लोग अपने प्रियजनों की मौत के बाद उनका शव बांस के पट्टियों पर बैठाकर उन्हें आखिरी विदाई देते हैं। पर बांस की पट्टियां जल्दी जल जाती हैं, वहीं शव अधजले रह जाते हैं। पर ये जनजाति उस अधजले शव को दफनाती नहीं है, न ही उन्हें दुबारा आग के हवाले करती हैं, बल्कि उन्हें वहीं पर छोड़ देती हैं।
असेकी जनजाति का ऐसा करने के पीछे जो परंपरा है, वो है शरीर का पंचतत्व में मिलना। आग के माध्यम से शरीर के जरूरी हिस्से आग और हवा में मिल जाते हैं, तो बाकी का हिस्सा धीरे धीरे अपना आकार खोता है। और फिर वो तबतक वहां रहता है, जबतक समंदर की लहरें या बारिश का पानी उन्हें पूरी तरह से नष्ट न कर दें। वैसे, इस जनजाति के लोग इसाई धर्म को मानने लगे हैं। यहां सबसे पहले 1910 के दशक में इसाईयों का समूह पहुंचा था, जिन्होंने उनका धर्मांतरण कराया। पर ये प्रथा सदियों से बदस्तूर चली ही आ रही है। इस प्रथा के बारे में हाल ही में लोगों ने तब जाना, जब इसपर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई गई।

