पिपरमेंट फसल भी मिटने के कगार पर
https://husainijnp.blogspot.com/2016/04/blog-post_399.html
बाराबंकी। सूखी नहरें, उजड़े तालाब, वीरान हुए कुओं के चलते लगातार गिर रहे भूजलस्तर से हैण्डपम्प, पम्पिंग सेट बोटिगे भी जवाब देने लगी है। समय रहते नहरों में पानी का संचालन नही शुरु हुआ तो आने वाले कुछ ही दिनो बाद जहां बेजुबान पशु-पक्षियों का जीवन संकट में पड़ जायेगा। वहीं किसानों को ग्रीन सिल्वर (पिपरमेंट) की खेती को बचाना मुश्किल हो जायेगा।
उल्लेखनीय हो कि वर्तमान में पड़ रही भीषण गर्मी एवं तपिस से जन मानस सहित पशु-पक्षी बेहाल है। गर्मी के साथ-साथ लगातार हो भूगर्भ जल स्तर के गिरावट से पानी समस्या दिन पर दिन गंभीर होती जा रही है। भूगर्भ जलस्तर को समायोजित बनाये रखने के लिये जहां पुराने तालाबों का आस्तित्व खत्म होता जा रहा है। वहीं भूजलस्तर को सही बनाये रखने में सबसे मददगार पुरखो की धरोहर कुओं का अस्तित्व खत्म होने के कगार पर है। वहीं किसानों को बड़ी राहत देने वाली नहरों की लम्बी पानी बंदी से किसानो के चेहरे मुरझाते जा रहे है। नहरों में पानी न होने के कारण किसी समय जन मानस सहित किसानों का कल्याण करने वाली कल्याणी नदी स्वयं प्यासी लगी है। किसानों का आभूषण कही जाने वाली खेती जब प्रभावित होती है तो किसान झकझोर जाता है और इसका असर देश की खा़द्यान्न व्यवस्था तक पड़ता है। बाराबंकी जिला पिपरमिन्ट की खेती के रुप में प्रमुखता से जाना जाता है। यहां के किसानों की आर्थिक प्रगति मेंथा खेती पर ही निर्भर है। परन्तु किसानों की बदनसीबी कही जाये या सरकार की लापरवाही कि वर्तमान समय में जब किसानो की मेंथा खेती की सिचाई के लिये पानी की जरुरत है। तो नहरो में रेत उड़ रही है। नहरो में पानी न होने के कारण क्षेत्र की तमाम डेªने नाले जो नहरो के पानी पर निर्भर है। वह सूख गये है। चुनावी वर्ष में नहर विभाग द्वारा लम्बी नहर बंदी सरकार के लिये चुनौती साबित हो सकती है यदि समय रहते शासन ने नहर बंदी की ओर ध्यान नही दिया तो आने वाले वर्ष-2017 के विधानसभा चुनाव मंे किसानो के बीच नजर का पानी चुनावी मुद्दा बन सकता है। जिसका खामियाजा अखिलेश सरकार को उठाना पड़ सकता है। क्योंकि किसान स्वयं प्यासा रहकर अपनी फसला0ें की सिचाई के लिये सब कुछ कर सकता है। नहर बंदी के चलते किसान सेठ-साहूकारो से कर्ज लेकर मेंथा फसल की सिचाई करने को मजबूर है। नहरों में लम्बे सयम से पानी न होने के कारण नदी, तालाब, डेªनो का पानी खत्म होने के कगार पर है। जिससे बेजुबान पशु-पक्षियों के लिये पानी घातक समस्या बन सकता है। क्योंकि बेजुबान पशु-पक्षियों के लिये पानी इन्ही श्रोतों से मिला है।
उल्लेखनीय हो कि वर्तमान में पड़ रही भीषण गर्मी एवं तपिस से जन मानस सहित पशु-पक्षी बेहाल है। गर्मी के साथ-साथ लगातार हो भूगर्भ जल स्तर के गिरावट से पानी समस्या दिन पर दिन गंभीर होती जा रही है। भूगर्भ जलस्तर को समायोजित बनाये रखने के लिये जहां पुराने तालाबों का आस्तित्व खत्म होता जा रहा है। वहीं भूजलस्तर को सही बनाये रखने में सबसे मददगार पुरखो की धरोहर कुओं का अस्तित्व खत्म होने के कगार पर है। वहीं किसानों को बड़ी राहत देने वाली नहरों की लम्बी पानी बंदी से किसानो के चेहरे मुरझाते जा रहे है। नहरों में पानी न होने के कारण किसी समय जन मानस सहित किसानों का कल्याण करने वाली कल्याणी नदी स्वयं प्यासी लगी है। किसानों का आभूषण कही जाने वाली खेती जब प्रभावित होती है तो किसान झकझोर जाता है और इसका असर देश की खा़द्यान्न व्यवस्था तक पड़ता है। बाराबंकी जिला पिपरमिन्ट की खेती के रुप में प्रमुखता से जाना जाता है। यहां के किसानों की आर्थिक प्रगति मेंथा खेती पर ही निर्भर है। परन्तु किसानों की बदनसीबी कही जाये या सरकार की लापरवाही कि वर्तमान समय में जब किसानो की मेंथा खेती की सिचाई के लिये पानी की जरुरत है। तो नहरो में रेत उड़ रही है। नहरो में पानी न होने के कारण क्षेत्र की तमाम डेªने नाले जो नहरो के पानी पर निर्भर है। वह सूख गये है। चुनावी वर्ष में नहर विभाग द्वारा लम्बी नहर बंदी सरकार के लिये चुनौती साबित हो सकती है यदि समय रहते शासन ने नहर बंदी की ओर ध्यान नही दिया तो आने वाले वर्ष-2017 के विधानसभा चुनाव मंे किसानो के बीच नजर का पानी चुनावी मुद्दा बन सकता है। जिसका खामियाजा अखिलेश सरकार को उठाना पड़ सकता है। क्योंकि किसान स्वयं प्यासा रहकर अपनी फसला0ें की सिचाई के लिये सब कुछ कर सकता है। नहर बंदी के चलते किसान सेठ-साहूकारो से कर्ज लेकर मेंथा फसल की सिचाई करने को मजबूर है। नहरों में लम्बे सयम से पानी न होने के कारण नदी, तालाब, डेªनो का पानी खत्म होने के कगार पर है। जिससे बेजुबान पशु-पक्षियों के लिये पानी घातक समस्या बन सकता है। क्योंकि बेजुबान पशु-पक्षियों के लिये पानी इन्ही श्रोतों से मिला है।

