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मेंथा, केला की खेती, यकेलिपटस की बागवानी बर रही है जल संकट की घड़ी

बाराबंकी। तीन दशक पूर्व न तो पिपरमेंट की खेती थी और न ही यूकेलिपटस की बागवानी परन्तु क्षेत्र में जब से इनकी खेती शुरु हुई है। तब से लगातार भूजल स्तर में गिरावट आती जा रही है। उल्लेखनीय हो कि यूकेलिपटस का एक औसत का पेड़ प्रतिदिन लगभग 100 लीटर पानी सोख लेता है और इसी तरह पिपरमेंट एवं केले की खेती में हर सप्ताह सिंचाई की जरुरत पड़ती है। मेंथा एवं केले की खेती का समय भीषण गर्मी के दौरान होने के कारण लगातार जल दोहन करना पड़ता है। नतीजा यह है कि ऐसा कोई क्षेत्र नही है जहां प्रति वर्ग किलो मीटर के अंदर एक दर्जन से कम बोरिंग न हो। जो प्रतिदिन जल दोहन कर फसलों की सिचाई करती रहती है। लगातार जलस्तर के गिरावट के चलते एक दशक पूर्व जो बोरिंग 60 फिट पर पानी देती थी वह आज 100-120 फिट पर ही पानी नही दे रही है।  

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