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हिन्दू-मुसलमान सबकी श्रद्धा का केन्द्र हैं बाबा रामसनेहीदास


अजमी रिज़वी
रामसनेहीघाट बाराबंकी। स्थानीय तहसील मुख्यालय से करीब देा किलोमीटर दूर
लखनऊ फैजाबाद राजमार्ग पर स्थित पवन पावन कल्याणी नदी के तट पर स्थित
बाबा रामसनेही दास की समाधि स्थली क्षेत्रवासियों के लिए श्रद्धा और
विश्वास का केंद्र बनी हुयी है क्षेत्र के लोगों का कहना है कि श्रद्धा
और विश्वास के साथ बाबा की समाधि पर मत्था टेकने से मनचाही मुराद पूरी हो
जाती है बाबा की समाधि हिन्दू और मुसलमान एकता का प्रतीक है यहां सभी
धर्माें के लोग आकर बाबा की समाधि पर अपना मत्था टेंककर उज्जवल भविष्य की
कामना करते है। यूं तो इस समाधि स्थली पर हर मंगलवार को सैकड़ों की तादात
में लेाग आकर मन्नत फूल प्रसाद चढ़ाकर अपनी अपनी कामना पूर्ण हेतु बाबा से
अनुनय विनय करते हैं लोगेां का यह भी कहना है कि बाबा के दर से कोई भी
फरियाद निराश नही हुआ है साल में दो बड़ा मेला होता है कार्तिक माह की
पूर्णिमा एवं चैत्र माह की शुक्ल पक्ष नौमी को जिसमें हजारों की संख्या
में श्रद्वालुओं की भीड़ हो जाती है समाधि स्थली के आसपास पर्याप्त जगह न
होने के कारण यहा आने वाले श्रद्धालुओको काफी दिक्कत का सामना करना पड़ता
है मजबूरन लोगों का जमावडा़ मुख्य मार्ग होता है जो आने जाने वाले वाहनों
सें खतरे का सूचक बना रहता है। यहां की भौगोलिक स्थित पहाडी नुमा है
कालान्तर में कभी यहां सैकड़ो बीघे का बडा ही घनघोर जंगल था जहा तमाम
प्रकार के हिंसक पशु भी रहते थे धीरे धीरे समय बदलता गया और जंगल काट कर
लोगों ने अपने मकान एवं खेत बना लिये आज भी काफी तादाद मंे जंगल देखा जा
सकता है बाबा के विषय में बताया जाता है कि अमैनी स्नान से आकर इस घनघोर
जंगल में तपस्या में लीन हो गये बाबा के विषय में यह भी बताया जाता है कि
बाबा रामसनेहीदास ने जिंदा समाधि ली थी बाबा के यश प्रताप के सामने
फिरंगियों को भी झुकना पड़ा इस परिपेक्ष्य में कहा जाता है कि अंग्रजी
शासन काल में पूर्वाचल को जोड़ने हेतु कल्याणी नदी पुल पर निर्माण कार्य
कराया जा रहा था वह पुल से गुजरने वाले मार्ग के बीच बाबा जी  की समाधि
स्थली आ रही थी लाजमी था कि यदि उस स्थान पर पुन का निर्माण हो जाता तो
बाबा की समाधि स्थली को हटाना होता अंग्रेजो की देखरेख में कुशल कारीगरों
द्धारा जितनी भी उपरोक्त पुल की जोडाई की जाती थी  स्वतः रातं को वह अपने
आप ढह जाती थी लाख कोशिसो के बावजूद यह कार्य  हफतों चलता रहा अंत मंे
बाबा को दया आई और रात्रि मंे पुल निर्माण कराने वाले फिरंगी आफीसर को
सपना दिया कि यदि तू पुल का निर्माण कराना चाहता है तो मेरी समाधि स्थली
का सपना छोडकार उतर दिशा में हटकर पुल का निर्माण करा तब पुल बन जायेगा
उसने बाबा का बचन का मानकर वैसा  ही किया आज भी पुल निर्माण हेतु  प्रथम
स्थान पर गलाई गयी कोठी देखी जा सकती हैदेवी देवता न मानने वाले फिरंगियो
को भी बाबा के प्रताप के सामने झुकना पडा। सबसे सोचनीय बात तो यह है कि
फिरंगियो को बाबा के प्रताप के आगे झुकना पड़ लेकिन इस रामसनेहीदासबाबा के
मन्दिर एवं कल्याणी पुल पर शासन प्रशासन की नजर अभी तक नही पडी
श्रद्धालुओ को नहाने के लिए कल्याणी नदी पर ना तो कोई घाट बनवाया गया है
और न ही मंन्दिर को कोई भी सुविधा प्रदान कि गई है अंग्रेजो द्वारा
बनवाया गया पुल भी अपनी दुर्दशा पर आसू बहा रहा है यह के पुजारी भोला
गोस्वामी,विजयगोस्वामी एवं श्री चन्द्र गोस्वामी सहित आदि लोगो का कहना
है की यहा शासन प्रशासन द्वारा इस मंन्दिर पर सुविधा न देने से
श्रद्धालुओ को काफी समस्यो का सामना करना पड़ता है। क्षेत्रीय तेज नरायन
शुक्ला, विमल तिवारी, भैरव प्रसाद तिवारी, लालजी तिवारी, अजय तिवारी,
अमरबहादुर सिंह, रामबाबू मिश्र, केपी श्रीवास्तव, संतोष सिंह, अवधेश
तिवारी, विमल तिवारी, राम सरन मौर्य, कमलेश वर्मा, किरसन अवस्थी, पिंटू
वर्मा, कपिल तिवारी आदि लोगो का कहना है कि जो संच्चे मंन से बाबा के
चौखट पर माथा टेकता है उसकी मनोकामना बाबा पूरी करते है।

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