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बिछड़ के तुझसे यह एहसास हुआ, कबीले में रौनक तुझी से थी...

अजमी रिज़वी / आसिफ हुसैन
बाराबंकी। दरार अगर मकानों में पड़ जाये तो एक बार मिटाई जा सकती हैं।
लेकिन अगर रिस्तों मे पड़ जायें तो मिटाना बहुत मुश्किल होता है। अपनो की
कमी हमेशा अखरती है। फिर चाहे वो किसी घर का प्रोग्राम हो या किसी
राजनैतिक दल का जलसा। बाराबंकी के जीआईसी आडीटोरियम बीते एक दिन पहले
समाजवादी पार्टी द्वारा होली मिलन एवं पंचायत प्रतिनिधि समागम का आयोजन
किया गया। कोई ताज्जुब की बात नही कि इसमें पूरे जिले से सपा में भरोसा
रखने वाले तमाम पंचायत प्रतिनिधियों ने अपनी सहभागिता निभाई। पूरा
आडीटोरियम सपा के रंग में रंगा हुआ था। बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाये गये थे।
आगन्तुकों के लिये खास इंतेजामात किये गये थे। मंच के ठीक पीछे एक बड़ी सी
होर्डिंग्स लगी हुई थी। जिसमें एक तरफ सबसे किनारे समाजवाद के जनक डा.
राम मनोहर लोहिया का चित्र छपा था। तो दूसरी तरफ सबसे किनारे बाराबंकी के
पुरोधा, जिले में समाजवाद के जनक, सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह यादव के
गुरु, सपा की आधारसिला स्व. रामसेवक यादव का चित्र छपा था। आडीटोरियम के
मंच पर सत्तानशीन दल के कई दिग्गज जिनमंे कबीना मंत्री और राज्यमंत्री भी
शामिल थे, मौजूद रहे। सब कुछ देखने में बड़ा आम सा था। लेकिन कहीं न कहीं
कुछ तो खास था। खास इतना कि जिस स्व. रामसेवक की फोटो उस होर्डिंग पर लगी
हुई थी। उनके पौत्र इस समागम से नदारद थे। लोगों की आपसी गुफ्तगू इस बात
पर आम होती दिखी कि आखिरकार क्या हिमांशू यादव को न्योता नही दिया गया।
बात दीगर है जिले में सपा कहीं न कहीं दो फांक में बंट रही है। एक बार
जरा थोड़ा सा दिमाग पर जोर डालना पड़ेगा। वर्ष 2012 का विधानसभा चुनाव। इस
चुनाव से पूर्व एक बात बहुत तेजी से लोगों के बीच उठी कि जिले में सपा के
कर्ताधर्ता अरविन्द सिंह गोप ही हैं। यह बात कुछ सपाईयों को ही नगवांर
गुजरी। यहां तक की सपा सुप्रीमों को लिखित शिकायती पत्र भी भेजा गया।
चुनाव हो गया। सपा की सरकार बन गयी। युवा मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश को
मिल गया। सब कुछ हुआ। यह चिंगारी चार साल बहुत धीरे-धीरे सुलगती रही।
वर्ष 2016 जिला पंचायत चुनाव में फिर यह चिंगारी थोड़ी सी लौ पकड़ती है।
लेकिन चूंकि सपा में खासी करीबी कबीना मंत्री की थी। इसलिए फिर इस
चिंगारी को दबाया जाता है। कबीना मंत्री के सगे भाई जिला पंचायत अध्यक्ष
र्निविरोध र्निवाचित हो जाते हैं। सपा मुखिया को इस चुनाव के मार्फत यह
संदेश देने की कोशिश की जाती है कि आप चिंता न करें। आल इज वेल। लेकिन
चंद दिनों के बाद ही एमएलसी चुनाव में राजेश यादव को टिकट देकर फिर अपनों
का दिल दुःखाया जाता है। लेकिन इस बात राजनीति की बिसात पर चौपड़ थोड़ी अलग
तरीके से खेली जाती है। बाराबंकी के पड़ोसी जनपद सीतापुर से आनन्द भदौरिया
निर्विरोध एमएलसी निर्वाचित होते हैं। यह सीतापुर जनपद के इतिहास में
पहली बार हुआ कि समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी ने निर्विरोध जीत दर्ज की।
लखनऊ-उन्नाव सीट से सुनील सिंह साजन निर्विरोध निर्वाचित होते हैं। लेकिन
बाराबंकी से, जोकि समाजवादी पार्टी का गढ़ है, यहीं से राजेश यादव को अपने
प्रतिद्वन्दियों से चुनावी सामना करना पड़ता है। सूत्रों की माने तो,
अन्दर ही अन्दर सपा सुप्रीमो इस बात से काफी नाराज थे। जिले के तीनों खास
वजीरों की क्लास भी लेते हैं। लेकिन जब राजनीति के अंदर राजनीति हो रही
हो, तो और लोग कर भी क्या सकते हैं। अपनों की नाराजगी कई बार मंच से
जगजाहिर हुई। ऊपर बैठे हुए लोगों को इस बात की शायद जानकारी हो या न हो,
लेकिन आमजन से कुछ भी छिपा नहीं है। बाराबंकी विधानसभा क्षेत्र के कुछ
ऐसे गांव है जो कि समाजवादी पार्टी के गढ़ हैं। लेकिन उनमें भी अब सपा के
खिलाफ अंदरूनी बगावत उठने लगी है। ग्राम दरामनगर, छेदानगर, सरांय
अकबराबाद, शैलखा, सतरिख एवं तमाम कई क्षेत्र समाजवादी पार्टी की पकड़ से
बाहर होते जा रहे हैं। यह सब कुछ अचानक नहीं हो रहा है। जब किसी चीज पर
बार-बार चोट दी जाती है, स्वाभाविक है कि उसका स्वरूप बदल जायेगा। ऐसा ही
कुछ हो रहा है बाराबंकी की समाजवादी पार्टी के स्वरूप में। होली मिलन एवं
पंचायत प्रतिनिधि समागम में स्व. रामसेवक यादव का चित्र लगाकर लोगों को
यह संदेश देने की कोशिश की गयी कि बाराबंकी में सपा आज भी स्व. रामसेवक
यादव को अपना पुरोधा मानती है। लेकिन उनके पौत्र की गैरमौजूदगी लोगों के
बीच चर्चा को विषय जरूर बनीं। अपनों की नामौजूदगी कहीं न कहीं पार्टी के
कार्यकर्ताओं एवं खास लोगों को अखरी जरूर है। दो पंक्तियां और बात
खत्म...’बिछड़ के तुझसे यह एहसास हुआ, कबीले में रौनक तुझी से थी।’

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