जो जस करइ, सो तस फल चाखा...
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बाराबंकी। मनुष्य को अपने कर्माे के अनुसार फल मिलता है।
इसलिए उसे भगवान से किसी प्रकार की चोरी नही करनी चाहिए क्योकि उससे कुछ
भी छुपा नही है। वह हर स्थान पर विद्यमान है, जो मनुष्य जिस प्रकार का
कार्य करता है। उसको उसी अनुसार भोगना पडता है। उक्त विचार क्षेत्र के
अन्तर्गत ग्राम टडिया मजरे महुलारा में सूरदार घनश्याम मिश्र के यहाँ पर
चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा महापुराण मे पूरे शुक्लान हथौंधा सेे
पधारे व्यास वक्ता पंडित शिवकैलाश शुक्ल जी महराज ने श्रोताओं को कथा
सुनाते हुए कही। कथा के छठे दिन श्री व्यास जी महराज ने सुदामा चरित्र की
कथा को श्रोताओं को सुनाते हुए कहा कि सुदामा व भगवान श्रीकृष्ण जी बहुत
की घनिष्ट मित्र थे। लेकिन सुदामा ने भगवान से बोला गया एक झूठ ने उन्हें
बेहद गरीब बना दिया और वह दाने के मोहताज हो गये। लेकिन सुदामा ने गरीबी
में रहते हुए भी उनकी भगवान के प्रति भक्ति कम नही हुई और वह बिना भगवान
का भोग लगाये अन्न ग्रहण नहीं करते थे और कभी दरिद्रता के लिये ईश्वर पर
दोषारोपण भी नहीं किया। श्री व्यास ने कहा कि वह काफी गरीब होने के बाद
भी अपना दुख दर्द बताने के लिए कभी भी अपने परम सखा के पास नही गये। आखिर
में भगवान की प्रेरणा से अपनी पत्नी के समझाने पर वह भगवान श्री कृष्ण के
पास गये लेकिन उन्होने उनसे सबकुछ छुपा लिया। अपना दुखदर्द अपने अन्दर ही
रखे रहें लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा की भगवान के प्रति की जा रही।
अटूट भक्ती व सदकर्मो से उन्हे साधारण नर से नारायण का अतिथि बनाकर दो
लोको का स्वामी बना दिया। इस मौके पर अजय तिवारी, संतोष मिश्र, राजन
तिवारी, गुरूप्रसाद, ज्ञानेन्द्र तिवारी, विमल तिवारी, प्रमोद, सहित
सैकडो श्रोताओ ने कथा का रस पान किया।

