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विकास के नाम पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई, सूखे का कारण

नई दिल्ली: बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने एवं विकास के नाम पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई को पर्यावरणविद ग्लोबल वामिग और जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण बताते हैं। जंगलों के घटते क्षेत्रफल के कारण बारिश की मात्रा में कमी आई है और एेसे में पिछले दो शताब्दी में जहां 16 वर्षो में एक बार सूखा पड़ता था, वहीं 1968 के बाद से हर 16 वर्ष में तीन बार बड़ा सूखा पड़ रहा है।  
पर्यावरणविद एवं सामाजिक कार्यकर्ता के के जैन ने कहा कि जंगलों का लगातार कम होता क्षेत्रफल पर्यावरण के लिए गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। जंगल एवं बारिश के एक दूसरे से जुड़े होने के कारण पानी के संकट के लिए भी वन क्षेत्र में कमी एक प्रमुख कारक है। उन्होंने कहा कि भारत के वन क्षेत्र पर स्थिति रिपोर्ट 2015 के मुताबिक, जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, उत्तराखंड, अरूणाचल प्रदेश, तेलंगाना में जंगल तेजी से घटे हैं।  
जैन ने कहा कि पूरे भारत की बात करें तरे 19वीं एवं 20वीं शताब्दी में देश में केवल 12 बार सूखा पड़ा, अर्थात 16 वर्ष में एक बार सूखा पड़ा । लेकिन साल 1968 के बाद से सूखे की तादाद में वृद्धि आई। 1968 से 1992 के बीच प्रत्येक 16 वर्ष में 3 बार सूखा पड़ा। 2004-05 से 2007-08 के बीच चार बार गंभीर सूखा पड़ा।
पर्यावरण विशेषज्ञ शोभित शास्त्री ने कहा कि देश में पानी की समस्या का कारण पिछले वर्षो में बारिश की मात्रा में कमी रही है। बारिश की कमी के लिए वनों की अंधाधुंध कटाई एक प्रमुख कारक है। उन्होंने कहा कि जिस तरह बेतरतीब तरीके से विकास किया जा रहा है उसका खामियाजा जल, जंगल और जमीन को भुगतना पड़ रहा है। यह आने वाले समय में हमारे लिये नुकसानदायक होगा। जंगल का कम होना बेहद चिन्ताजनक है। हमें सन्तुलित विकास करना चाहिए। इसके लिये दीर्घकालीन योजना बनाने की जरूरत हैै। 

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