प्रीति और दया ने दी जोड़-तोड़ की राजनीति को हवा
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश में राज्य विधान परिषद और राज्यसभा चुनाव मैदान में उतरे एक-एक अतिरिक्त उम्मीदवार ने जोड़-तोड़ और खरीद-फरोख्त की अटकलों को हवा दे दी है। राज्य विधान परिषद की 13 सीटों के लिए 14 और राज्यसभा की 11 सीटों के लिए 12 प्रत्याशी मैदान में हैं। दोनों ही उच्च सदनों के चुनाव में एक-एक प्रत्याशी की हार तय है। राज्य विधान परिषद के लिए मतदान 10 जून को और राज्यसभा के लिए 11 जून को होगा। राज्यसभा के लगभग निर्विरोध माने जाने वाले चुनाव की नामांकन प्रक्रिया के समाप्त होने से ठीक पहले औद्योगिक घराने से ताल्लुक रखने वाली प्रीति महापात्रा ने एंट्री मारी।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की करीबी मानी जाने वाली प्रीति महापात्रा के राज्यसभा के लिए नामांकन के साथ मतदान की नौबत लगभग तय हो गई। नाम वापसी की आखिरी तारीख तक किसी भी प्रत्याशी के टस से मस न होने से राजनीतिक दलों ने मतदान के लिए नए सिरे से अपनी राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी। इसी तरह विधान परिषद की रिक्त 13 सीटों के लिए 14 उम्मीदवारों ने पर्चा दाखिल कर दिया। भाजपा के 2 उम्मीदवारों भूपेन्द्र चौधरी और दया शंकर सिंह के नामांकन के अन्तिम दिन पर्चा दाखिल कर देने के साथ ही निर्धारित सीट से एक उम्मीदवार अधिक हो गया।
पार्टी ने भूपेन्द्र चौधरी को पहला और दयाशंकर सिंह को दूसरा उम्मीदवार घोषित किया है। सिंह को इससे पहले 2014 में भी पार्टी ने विधान परिषद का चुनाव लड़ाया था, लेकिन 12 अतिरिक्त मत की ‘व्यवस्था’ कर लेने के बावजूद वह हार गए थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने प्रीति को चुनाव मैदान में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उतारकर कांग्रेस प्रत्याशी कपिल सिब्बल का गणित बिगाडऩे की योजना बनाई है। भाजपा के रणनीतिकार कांग्रेस विधायकों में तोड़-फोड़ कर सिब्बल को हराने की उम्मीदें संजोए बैठे हैं।
विश्लेषकों का दावा है कि भाजपा राज्यसभा के लिए एक प्रत्याशी आसानी से जिता लेगी और बचे हुए वोट प्रीति को देगी। प्रीति की जीत तभी हो सकती है जब उन्हें निर्दलीयों के साथ ही दूसरे दलों के कुछ विधायकों का समर्थन मिले। राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए पहली वरीयता के 34 वोटों की जरूरत है। उधर, उत्तर प्रदेश राज्य विधानसभा में कांग्रेस के सदस्यों की तादाद 29 है। सिब्बल की जीत के लिए कम से कम 5 अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी। कांग्रेस के कुछ विधायकों की क्रॉस वोटिंग की आशंका के चलते डैमेज कंट्रोल की तैयारी शुरू हो गई है। कांग्रेस की उम्मीदें बसपा के 12 अतिरिक्त वोटों और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के 8 विधायकों पर टिकी हैं।
उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी (सपा) विधान परिषद के अपने 8 प्रत्याशियों को विजय दिलाने में सक्षम है मगर राज्यसभा के 7 प्रत्याशियों को जीत का परचम लहराने के लिए उसे 6 अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी। सपा के 229 विधायक हैं और उसे पीस पार्टी के 2 और एक निर्दलीय विधायक का समर्थन हासिल है। राज्यसभा की 7 सीटें जीतने के लिए सपा को पहली वरीयता के 239 वोटों की जरूरत है।
यहां दिलचस्प तथ्य यह है कि सपा के निलंबित विधायक रामपाल यादव बागी तेवर अख्तियार किए हुए हैं। वह प्रीति महापात्रा के प्रस्तावक भी बने हैं। उनके अलावा भी एक-दो और विधायक सपा के संदिग्धों की श्रेणी में हैं। उन पर लगातार नजर रखी जा रही है। सपा की उम्मीदें रालोद पर टिकी हुई हैं। बसपा राज्यसभा के दोनों प्रत्याशियों को आसानी से जिता लेगी लेकिन विधान परिषद में 3 सीट जीतने के लिए 7 और वोटों की जरूरत है। बसपा इसके लिए निर्दलीयों, छोटे दलों और रालोद के संपर्क में है।
बसपा में भी कुछ विधायकों की क्रॉस वोटिंग का अंदेशा है। एक-दो विधायक खुलकर बागी तेवर अख्तियार कर रहे हैं। उसे भी डैमेज कंट्रोल करना है। राज्य विधानसभा में मात्र 8 सीटों का प्रतिनिधित्व करने वाली रालोद का इस चुनाव में महत्व बढ़ गया है। सपा और कांग्रेस को राज्यसभा तथा बसपा को विधान परिषद चुनाव में रालोद की जरूरत है। भाजपा भी रालोद विधायकों पर डोरे डाल रही है। ऐसे में रालोद के सामने अपने विधायकों को एकजुट रखने की कड़ी चुनौती है।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की करीबी मानी जाने वाली प्रीति महापात्रा के राज्यसभा के लिए नामांकन के साथ मतदान की नौबत लगभग तय हो गई। नाम वापसी की आखिरी तारीख तक किसी भी प्रत्याशी के टस से मस न होने से राजनीतिक दलों ने मतदान के लिए नए सिरे से अपनी राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी। इसी तरह विधान परिषद की रिक्त 13 सीटों के लिए 14 उम्मीदवारों ने पर्चा दाखिल कर दिया। भाजपा के 2 उम्मीदवारों भूपेन्द्र चौधरी और दया शंकर सिंह के नामांकन के अन्तिम दिन पर्चा दाखिल कर देने के साथ ही निर्धारित सीट से एक उम्मीदवार अधिक हो गया।
पार्टी ने भूपेन्द्र चौधरी को पहला और दयाशंकर सिंह को दूसरा उम्मीदवार घोषित किया है। सिंह को इससे पहले 2014 में भी पार्टी ने विधान परिषद का चुनाव लड़ाया था, लेकिन 12 अतिरिक्त मत की ‘व्यवस्था’ कर लेने के बावजूद वह हार गए थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने प्रीति को चुनाव मैदान में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में उतारकर कांग्रेस प्रत्याशी कपिल सिब्बल का गणित बिगाडऩे की योजना बनाई है। भाजपा के रणनीतिकार कांग्रेस विधायकों में तोड़-फोड़ कर सिब्बल को हराने की उम्मीदें संजोए बैठे हैं।
विश्लेषकों का दावा है कि भाजपा राज्यसभा के लिए एक प्रत्याशी आसानी से जिता लेगी और बचे हुए वोट प्रीति को देगी। प्रीति की जीत तभी हो सकती है जब उन्हें निर्दलीयों के साथ ही दूसरे दलों के कुछ विधायकों का समर्थन मिले। राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए पहली वरीयता के 34 वोटों की जरूरत है। उधर, उत्तर प्रदेश राज्य विधानसभा में कांग्रेस के सदस्यों की तादाद 29 है। सिब्बल की जीत के लिए कम से कम 5 अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी। कांग्रेस के कुछ विधायकों की क्रॉस वोटिंग की आशंका के चलते डैमेज कंट्रोल की तैयारी शुरू हो गई है। कांग्रेस की उम्मीदें बसपा के 12 अतिरिक्त वोटों और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के 8 विधायकों पर टिकी हैं।
उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी (सपा) विधान परिषद के अपने 8 प्रत्याशियों को विजय दिलाने में सक्षम है मगर राज्यसभा के 7 प्रत्याशियों को जीत का परचम लहराने के लिए उसे 6 अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी। सपा के 229 विधायक हैं और उसे पीस पार्टी के 2 और एक निर्दलीय विधायक का समर्थन हासिल है। राज्यसभा की 7 सीटें जीतने के लिए सपा को पहली वरीयता के 239 वोटों की जरूरत है।
यहां दिलचस्प तथ्य यह है कि सपा के निलंबित विधायक रामपाल यादव बागी तेवर अख्तियार किए हुए हैं। वह प्रीति महापात्रा के प्रस्तावक भी बने हैं। उनके अलावा भी एक-दो और विधायक सपा के संदिग्धों की श्रेणी में हैं। उन पर लगातार नजर रखी जा रही है। सपा की उम्मीदें रालोद पर टिकी हुई हैं। बसपा राज्यसभा के दोनों प्रत्याशियों को आसानी से जिता लेगी लेकिन विधान परिषद में 3 सीट जीतने के लिए 7 और वोटों की जरूरत है। बसपा इसके लिए निर्दलीयों, छोटे दलों और रालोद के संपर्क में है।
बसपा में भी कुछ विधायकों की क्रॉस वोटिंग का अंदेशा है। एक-दो विधायक खुलकर बागी तेवर अख्तियार कर रहे हैं। उसे भी डैमेज कंट्रोल करना है। राज्य विधानसभा में मात्र 8 सीटों का प्रतिनिधित्व करने वाली रालोद का इस चुनाव में महत्व बढ़ गया है। सपा और कांग्रेस को राज्यसभा तथा बसपा को विधान परिषद चुनाव में रालोद की जरूरत है। भाजपा भी रालोद विधायकों पर डोरे डाल रही है। ऐसे में रालोद के सामने अपने विधायकों को एकजुट रखने की कड़ी चुनौती है।

