नगर में बदहाल सड़के, कमीशनखोरी हावी
https://husainijnp.blogspot.com/2016/07/blog-post_144.html
बाराबंकी। एक पुरानी फिल्म पर गाना याद आया, ‘धीरे से आना गलियन में‘। उस
गाने का परिदृश्य भले ही कुछ रहा हो लेकिन बाराबंकी नगर में खस्ताहाल
सड़के और रोडवेज बस के पास जल भराव जरुर इस गाने को सार्थक करता नजर आता
है। सड़कें जरा सी बारिश में ऐसी डब डबा जाती हैं। जैसे किसी हसमुख इंसान
की आंखे जरा सी ठेस पर भर आती हों। बड़ा नाम है बाराबंकी का पूरे यूपी
में। सूबा तो छोड़िये आस पास के कई सूबो में गलती से अगर बाराबंकी बता
दिया तो ऊपर वाला मालिक। खैर शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग आदि में भले ही
बाराबंकी प्रगति की ओर हो लेकिन मूलभूत विकास अभी भी कोषो दूर नजर आ रहा
है। बाराबंकी नगर क्षेत्र में सड़कें यहां के जन प्रतिनिधियों एवं प्रशासन
की असलियत बताने के लिये काफी हैं। नगर क्षेत्र में बाराबंकी डिपो के
आसपास तनिक सी बारिश जल भराव का बड़ा कारण बन जाती है। बस स्टाप से रेलवे
स्टेशन जाने वाला मार्ग अत्यंत जर्जर होने के कारण बारिश का शिकार सबसे
पहले होता है। सड़क तो जैसे गढ्ढ़ो में कही खो गयी है और प्रशासन को यह
गढ्ढा युक्त सड़क शायद नजर ही नही आती। डिपो के किनारे की सड़क होने के
कारण भोर पहर से देर रात तक यात्रियों की आवाजाही भी बनी रहती है। बगल
में कचेहरी कुछ दूर पर रेलवे स्टेशन, शहर के लिये साधन सब कुछ तो वहीं से
मिलता है। लेकिन इसके बावजूद इस मार्ग को सुधरवाने की सुध कोई लेना नही
चाहता। चूंकि सड़क खराब है इसलिये जल भराव हो रहा है। पानी का बहाव कहां
है किधर है किसी को नही मालूम। लेकिन सारा पानी बस स्टाप पर आसरा ले लेता
है। अब सबसे ज्यादा तकलीफ यात्रियों को सहनी पड़ती है। जो बेचारे बड़ी दूर
से साफ सुथरे कपड़े पहनकर कहीं रिश्तेदारी में जाने भर की सोंच लें, तय है
बाराबंकी स्टेशन पर उनका रंग रोगन हो जायेगा। अब बात यह आती है कि
आखिरकार इस सड़क को बनाया क्यों नही जा रहा। मार्ग पर अध्धे पत्थर डालकर
बाराबंकी में बिल्कुल अमरनाथ यात्रा के रास्ते की फीलिंग दे रहे हैं।
लेकिन सबसे ज्यादा दिक्कत इस मार्ग पर चलने वाले बुजुर्गों, तिपहिया, दो
पहिया वाहनो को होती है। युवा में तो वैसे भी जोश है। कूदते फांदते निकल
जाते हैं। आखिरकार इस मर्ज की कोई दवा भी तो होगी। जिले में बदहाल हो रही
सड़कें भले ही नेताओं को न दिखती हों लेकिन जनता को उन्ही रास्तों पर से
होकर गुजरना पड़ता है। लक्जरी गाड़ियों में झटके नही मालूम पड़ते। इसीलिये
शायद सफेदपोशों को जनता के दर्द का एहसास भी नही होता। कुछ तो लोग
गिरेंगे, लोगों का काम है गिरना। लेकिन प्रशासन अभी इस ओर कोई सुध लेता
नही दिख रहा है। जिससे स्थानीय लोगों के साथ-साथ यात्रियों में भी रोष बढ़
रहा है। प्रशासन, नेता अगर जनता के हित जरा भी सोंच लें तो यह तय है कि
विकास की डोर दिन दूनी रात चौगनी बढ़ती जायेगी। आखिरी में एक शेर और बात
खत्म हमको ले जायेगा साहिल तक भरोसा जिस पे था, वो हमे मझधार में लाकर
किनारा कर गया।

