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दयाशंकर के बातों को बिना समझे ही हुआ हंगामा: रंजीत

बाराबंकी। देश में दयाशंकर सिंह द्वारा कहे गये बयानों के शब्दों का
उद्देश्य या अभिप्राय को समझने की आवश्यकता नहीं की जा रही है। उनका
अभिप्राय अथवा उद्देश्य समझाने की कोशिश करते हुए आज बुधवार को नगर
पालिका परिषद के अध्यक्ष एवं रामजन्म भूमि मंदिर निर्माण न्यास के प्रदेश
अध्यक्ष रंजीत बहादुर श्रीवास्तव ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि
दयाशंकर सिंह व बसपा सुप्रीमो मायावती व नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर पुलिस
द्वारा की जा रही पक्षपात पूर्ण कार्यवाही पर देश की जनता अचंम्भित है।
एक तरफ पुलिस नसीमुद्दीन द्वारा ‘पेश करो-पेश करो’ शब्द की अपराधिक होने
न होने की जांच कर रही है तो दूसरी तरफ दयाशंकर द्वारा मायावती को
‘वैश्या या वेश्या’ चरित्र की टिप्पणी पर तुरन्त उसे अमर्यादित और
अपमानजनक मानते हुए कार्यवाही कर रही है। बगैर यह समझे कि यह टिप्पणी किन
अर्थों में है और किस उद्देश्य से की गयी है। नेशनल बुक ट्रस्ट इण्डिया
द्वारा प्रकाशित समातर कोष जो दो खण्डों में 1768 पृष्ठ का है विश्व का
प्रथम प्रमाणित हिन्दी शब्द कोष है। लेखक है अरविन्द कुमार कुसुम कुमार
में पेज नं0 732-23 उल्लिखित है। चारो वर्णों की स्त्रियों के पर्यायवाची
शब्द। यथा ब्राम्हण स्त्री- द्विजा, पंडिताइन, ब्राम्हनी, ब्रहमनी आदि
क्षत्रिय स्त्री- क्षत्रापी, क्षत्रिया, ठकुरानी आदि शूद स्त्री- अत्यंजा
अंत्या बृजली शूद्री आदि इसी तरह वैश्य स्त्री- को आर्या, आर्याणी आर्यी
और ‘वैश्या’ कहा जाता है। इसलिए यदि वैश्या शब्द कहा गया तो न तो वह
अमर्यादित है और न ही अपमान जनक। अपितु यह तो सम्मान बढ़ाने वाला शब्द
माना जा सकता है। यदि वेश्या शब्द भी इस्तेमाल हो गया हो (जबकि जबान
फिसलने की बात दयाशंकर सिंह स्वयं स्वीकार कर चुके है) तब भी उसके अन्य
अर्थो और संदर्भो की भी विवेचना होनी चाहिए। आप देख सकते है वेश्या के
कुछ पर्यायवाची शब्द जो इसी पुस्तक के पेज नं0 807-05 पर उद्घृत है जो
कदापि घृणित और असम्मान जनक नहीं है। जैसे गणिका अर्थात ‘गणपति इति
गणिका’ अर्थ जो ‘रूपया गिनें’, वेशं (बाजार) आजीवो यस्याः सा वेश्याः’
जिसकी आजीविका में बाजार हेतु हो इसमें दुकानकदार महिलाए भी हो सकती है।
‘रूपजीवा’, रूपम आजीवो अस्य सा जिसकी आजीविका रूप हो जिसमें फिल्म
अभिनेत्री आ सकती हैं। वारांगना, बारबन्ता, वारमुखी, बारकन्या यह शब्द
बार नर्तकियों के लिए प्रयुक्त हैं। इनके लाइसेन्स तो स्वयं सरकार देती
है। क्या इन्हे अनैतिकता की श्रेणी में शामिल किया जा सकता है? इस शब्द
का एक पर्यायवाची शब्द जनपद कल्याणी भी है किन्तु इन सब उद्बोधनों के
पीछे उद्देश्य या अभिप्राय प्रमुख है। विडम्बना यह है कि पुलिस के साथ
साथ सर्वोच्च नेता भी इसकी एक तरफा निन्दा करने पर तुले है। पेश करो शब्द
पर नसीमुद्दीन सिद्दीकी की सफाई मायावती द्वारा दी जा चुकी है। दयाशंकर
की टिप्पणी पर कार्यवाही उपरोक्त पर्यायवाची शब्दों के अर्थों के आधार पर
ही होनी चाहिए। यदि दयाशंकर की टिप्पणी अपमान करने वाली है तो पेश करो
पेश करो की टिप्पणी भी दया शंकर के परिवार को भी अपमानित करने वाली है
इसलिए समान न्याय के लिए संविधान की अनुच्छेद 22 के अनुसार भी प्रकरण
पूर्ण जांच होने तक कार्यवाही लम्बित होने योग्य है।

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