शीला पर यूपी-कांग्रेस में दो फाड़ का खतरा
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नई दिल्ली: 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को 78 वर्ष की उम्र में 403 विधानसभी वाले प्रदेश में मुख्यमंत्री बनाने को लेकर उत्तर प्रदेश के कांग्रेसियों में अंदरूनी असंतोष के स्वर सुनाई देने लगे हैं। कांग्रेस के उच्च पदस्थ सूत्रों का मानना है कि शीला को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित का न केवल राहुल गांधी ने विरोध किया था बल्कि प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी गुलामनबी ने भी आगाह किया था कि उत्तर प्रदेश में राजनीतिक तौर पर बहुत परिपक्व मतदाता शीला दीक्षित के नाम को कतई स्वीकार नहीं करेंगे।
सूत्रों का कहना है कि प्रियंका ही आखिर तक इस जिद पर अड़ी रही कि शीला को ही मुख्यमंत्री का चेहरा बनाया जाना चाहिए क्योंकि गुटों व धड़ों में बंटी प्रदेश कांग्रेस में दूसरा सर्वमान्य चेहरा एक दूसरे गुट को हरगिज स्वीकार नहीं होगा। शीला के पक्ष में महज यही बात जाती है कि उनका ससुराल कन्नौज में है और एक बार वे यूपी की सांसद रहीं। उसके बाद उनका यूपी के मतदाताओं व वहां की राजनीति से कहीं भी कोई ताल्लुक नहीं रहा।
कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने किसी ब्राह्मण चेहरे को उप्र में पार्टी का सीएम चेहरा बनाने की जोरदार पैरवी की थी। सूत्र बताते हैं कि गुलामनबी की अपनी राय यह थी कि शीला दीक्षित के तौर पर उम्र के अंतिम पड़ाव में ब्राह्मण जाति के मुल्लमे के आधार पर प्रदेश के कांग्रेस कार्यकर्त्ता उन्हें स्वीकार करने की बजाय एकदम निष्क्रिय हो जाएंगे।
सूत्रों का कहना है कि इस पर कांग्रेस की अग्रिम पंक्ति के सभी प्रमुख नेता व्यक्तिगत तौर पर शीला के नाम पर बंटे हुए थे क्योंकि उनमें से कईयों ने अलग-अलग वजह से गुलामनबी से मिलकर शीला के नाम पर आपत्तियां जताई थी।
सूत्रों का कहना है कि प्रियंका ही आखिर तक इस जिद पर अड़ी रही कि शीला को ही मुख्यमंत्री का चेहरा बनाया जाना चाहिए क्योंकि गुटों व धड़ों में बंटी प्रदेश कांग्रेस में दूसरा सर्वमान्य चेहरा एक दूसरे गुट को हरगिज स्वीकार नहीं होगा। शीला के पक्ष में महज यही बात जाती है कि उनका ससुराल कन्नौज में है और एक बार वे यूपी की सांसद रहीं। उसके बाद उनका यूपी के मतदाताओं व वहां की राजनीति से कहीं भी कोई ताल्लुक नहीं रहा।
कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने किसी ब्राह्मण चेहरे को उप्र में पार्टी का सीएम चेहरा बनाने की जोरदार पैरवी की थी। सूत्र बताते हैं कि गुलामनबी की अपनी राय यह थी कि शीला दीक्षित के तौर पर उम्र के अंतिम पड़ाव में ब्राह्मण जाति के मुल्लमे के आधार पर प्रदेश के कांग्रेस कार्यकर्त्ता उन्हें स्वीकार करने की बजाय एकदम निष्क्रिय हो जाएंगे।
सूत्रों का कहना है कि इस पर कांग्रेस की अग्रिम पंक्ति के सभी प्रमुख नेता व्यक्तिगत तौर पर शीला के नाम पर बंटे हुए थे क्योंकि उनमें से कईयों ने अलग-अलग वजह से गुलामनबी से मिलकर शीला के नाम पर आपत्तियां जताई थी।

