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2 दशक से अधिक का वक़्त बीता, नेता जी की कथनी-कथनी ही रही

🌕1993 में अपने चुनावी एजेंडे में सपा ने होमगार्ड जवानों को नियमित करने की कही थी बात
🌕मार्च 2015 में सुप्रीमकोर्ट दे चुका है निर्देश
असगर नकी
सुल्तानपुर । आखिर कब सुधरेगी होमगार्डों की स्थित? मौजूदा सरकार के प्रेरणा स्रोत मुलायम सिंह यादव जिनके लिये आम है कि नेता जी की "कथनी-करनी" में फ़र्क नहीं, शायद 1993 के सपा के चुनावी एजेंडे में  क्रम संख्या 9 पर  होमगार्ड जवानों को 5 वर्ष के अंदर नियमित कर दिये जाने की घोषणा नेता जी की कथनी थी, जिसे करनी में बदलने में दो दशक बीत गये और फिर उनके लाडले की मौजूदा समय में सरकार है लेकिन होमगार्डों की समस्या जस की तस है, जबकि देश की सबसे बड़ी अदालत का फैसला भी होमगार्डों के पक्ष में है, ऐसे में सवाल ये है कि आखिर नेता जी की करनी अमली जामा कब पहनेगी?
उ.प्र. होमगार्ड अवैतनिक अधिकारी व कर्मचारी एसोसिएशन के बैनर तले अध्यक्ष फिरोज़ अहमद की अगुवाई में होमगार्ड के सैकड़ों जवान तिकोनिया पार्क के प्रांगण में जमा हुए, इन सभी होमगार्ड जवानों की मांग थी कि "12 महीने की ड्यूटी, पुलिस के समान वेतन और पुलिस कर्मियों को मिलने वाली अन्य सुविधाएँ मुहैया कराई जायें"! इस आशय से सम्बंधित पत्र होमगार्ड जवानों द्वारा सूबे के मुखिया को  ज़िलाधिकारी के माध्यम से भेजा प्रेषित किया गया, जिसमें होमगार्डों ने अपनी बदहाल ज़िन्दगी का दर्द बया किया है।
मुख्यमंत्री को भेजे पत्र एवं इसमे संलग्न कुछ प्रतियों में जो लिखा था वो समाजवाद को कलंकित कर गया, सबसे पहले समाजवाद का दम भरने वालों के  घोषणा पत्र की बात की जाये,  1993 के अपने चुनावी एजेंडे में सपा प्रमुख नेता जी ने  क्रम संख्या 9 पर  होमगार्ड जवानों को 5 वर्ष के अंदर नियमित कर दिये जाने की घोषणा किया था और सच्चाई ये है की घोषणा पत्र को नियमित होने में दो दशक से अधिक का समय लग गया।
यही नहीं तत्कालीन मुख्यमंत्री राम नरेश यादव के कार्यकाल में होमगार्ड एक्ट में संशोधन किया गया लेकिन ये भी समस्त होमगार्ड को लाभ पहुंचाने के लिये नहीं बल्कि वोट बैंक की राजनीति के लिये, एक्ट संशोधन कर "रनर, धोबी, नाई, मोची, वी.ओ. और कमांडेंट स्तर के को वैतनिक कर इतिश्री कर जवानों को बेहाल छोड़ दिया गया।
अंत में चक्कर काटते हुए जवानों ने सुप्रीमकोर्ट की शरण ली, लम्बे अरसे के बाद 11 मार्च 2015 को कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देशित करते हुए फैसला दिया कि होमगार्ड जवानों को वेतन, ग्रेड, भत्ता और सरकारी सुविधाएँ दी जायें, अब हैरत इस बात पर है कि जो खुद किये वादों को दो दशक से अधिक समय में पूरा न कर पाये और फिर शीर्ष अदालत के निर्देश को ताक पर रखकर सरकार चला समाजवाद की बात करे क्या इसके बाद भी वो समाज का हितैषी समझा जा सकता है? ये वो सवाल है जिसका जवाब अतीत के गर्भ में है।

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