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तपोभूमि बनी बाबा रामसनेहीदास की समाधि स्थली

अजमी रिज़वी
दिनेश कुमार...
रामसनेहीघाट, बाराबंकी। स्थानीय तहसील मुख्यालय से करीब दो किलोमीटर दूर
लखनऊ फैजाबाद राजमार्ग पर स्थित पतित पावन कल्याणी नदी के तट पर स्थित
बाबा रामसनेहीदास की समाधि स्थली क्षेत्रवासियों के लिए श्रद्धा और
विश्वास का केंद्र बनी हुयी है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि श्रद्धा
और विश्वास के साथ बाबा की समाधि पर मत्था टेकने से मनचाही मुराद पूरी हो
जाती है। बाबा की समाधि हिन्दू और मुसलमान एकता का प्रतीक है। यहां सभी
धर्मां के लोग आकर बाबा की समाधि पर अपना मत्था टेंककर उज्जवल भविष्य की
कामना करते है। यूं तो बाबा रामसनेहीदास की समाधि स्थली पर हर मंगलवार को
सैकड़ों की तादाद में लोग आकर मन्नत फूल प्रसाद चढ़ाकर अपनी अपनी कामना
पूर्ण हेतु बाबा से विनय करते हैं। लोगों का यह भी कहना है कि बाबा के दर
से कोई भी फरियादी निराश नही हुआ है। कार्तिक माह की पूर्णिमा एवं चौत्र
माह की शुक्ल पक्ष नौमी पर साल में दो बड़ा मेला लगता है। जिसमें हजारों
की संख्या में श्रद्वालुओं की भीड़ हो जाती है समाधि स्थली के आसपास
प्रयाप्त जगह न होने के कारण यहा आने वाले श्रद्धालुओ को काफी दिक्कत का
सामना करना पड़ता है। मजबूरन लोगों का जमावडा मुख्य मार्ग होता है जो आने
जाने वाले वाहनों सें खतरे का सूचक बना रहता है। यहां की भौगोलिक स्थित
पहाडी नुमा है। कालान्तर में कभी यहां सैकड़ो बीघे का बडा ही घनघोर जंगल
था। जहां तमाम प्रकार के हिंसक पशु भी रहते थे। धीरे धीरे समय बदलता गया
और जंगल काट कर लोगों ने अपने मकान एवं खेत बना लिये है। आज भी काफी
तादाद में जंगल देखा जा सकता है। बाबा के विषय में बताया जाता है कि बाबा
मौनी स्नान से आकर इस घनघोर जंगल में तपस्या में लीन हो गये। बाबा के
विषय में यह भी बताया जाता है कि बाबा रामसनेहीदास ने जिंदा समाधि ली थी।
बाबा के यश प्रताप के सामने फिरंगियों को भी झुकना पड़ा। इस परिपेक्ष्य
में कहा जाता है कि अंग्रेजी शासन काल में पूर्वाचल को जोड़ने हेतु
कल्याणी नदी पुल पर निर्माण कार्य कराया जा रहा था। वह पुल से गुजरने
वाले मार्ग के बीच बाबा जी की समाधि स्थली आ रही थी। लाजमी था कि यदि उस
स्थान पर पुन का निर्माण हो जाता तो बाबा की समाधि स्थली को हटाना होता।
अंग्रेजो की देखरेख में कुशल कारीगरों द्धारा जितनी भी उपरोक्त पुल की
जुडाई की जाती थी। स्वतः रात को वह अपने आप ढह जाती थी। लाख कोशिशो के
बावजूद यह कार्य हफ्तों चलता रहा। अंत में बाबा को दया आई और रात्रि में
पुल निर्माण कराने वाले फिरंगी आफिसर को सपना दिया कि यदि तू पुल का
निर्माण कराना चाहता है तो मेरी समाधि स्थली का सपना छोडकार उतर दिशा में
हटकर पुल का निर्माण करा तब पुल बन जायेगा। उसने बाबा के बचन को मानकर
वैसा ही किया। आज भी पुल निर्माण हेतु प्रथम स्थान पर गलाई गयी कोठी देखी
जा सकती है। देवी देवता न मानने वाले फिरंगियो को भी बाबा के प्रताप के
सामने झुकना पडा। सबसे सोचनीय बात तो यह है कि फिरंगियो को बाबा के
प्रताप के आगे झुकना पड़ा लेकिन इस रामसनेहीदास बाबा के मन्दिर एवं
कल्याणी पुल पर शासन प्रशासन की नजर अभी तक नही पडी। श्रद्धालुओ को नहाने
के लिए कल्याणी नदी पर ना तो कोई घाट बनवाया गया है और न ही मंन्दिर को
कोई भी सुविधा प्रदान की गई है। अंग्रेजो द्वारा बनवाया गया पुल भी अपनी
दुर्दशा पर आसू बहा रहा है। यहां के पुजारी भोला गोस्वामी, विजय गोस्वामी
एवं श्रीचन्द्र गोस्वामी, मनोज तिवारी सहित आदि लोगो का कहना है कि यहां
शासन प्रशासन द्वारा इस मंन्दिर पर सुविधा न देने से श्रद्धालुओ को काफी
समस्यो का सामना करना पड़ता है। क्षेत्रीय ग्रामीण अजय तिवारी, तेज नरायन
शुक्ला, भोलानाथ मिश्रा, विमल तिवारी, अवधेश तिवारी, अंम्बिका प्रसाद
मिश्र, राम सरन मौर्य, मनोज श्रीवास्तव, संदीप कुमार, कपिल तिवारी आदि
लोगो का कहना है कि जो संच्चे मंन से बाबा के चौखट पर माथा टेकता है उसकी
मनोकामना बाबा पूरी करते है।

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