ओज कवि ‘विनय शुक्ला’ से साक्षात्कार के कुछ अंश......
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अजमी रिज़वी
बाराबंकी। कभी जिंदगी का साज ऐसे तराने छोड़ता है, जिसकी ताल और लय में
इंसान झूम उठता है। किसी के दोष निकालना बड़ा आसान है। लेकिन खुद को इस
समाज के सामने प्रस्तुत करना बहुत मुश्किल। शब्दों की लयबद्धता, सुर एवं
ताल का सामंजस्य लेकर देश की वर्तमान परिस्थितियों को हुबहू जनता के
सामने मंचो से रखना कोई छोटी बात नही। बाराबंकी की सरजमी सिर्फ
क्रान्तिकारियों की कर्मस्थली ही नहीं रही, वरन देश के तमाम प्रसिद्ध
साहित्यकारांे, राजनीतिज्ञों एवं कवियों की जन्मस्थली भी रही है। फिर
चाहे वह संत बैजनाथ रहे हों या मशहूर शायर खुमार बाराबंकवी। शमशी मीनाई
साहब भी बाराबंकी में पैदा हुए। बाबा होल राय, गुरु प्रसाद सिंह ‘मृगेश’,
डा. सागर आजमी, बृजनन्दन पाण्डेय, पण्डित नागेश्वर दत्त पाण्डेय, पण्डित
गिरजा शंकर मिश्रा, निगार साहब, चौधरी अली मुबारक सहित तमाम ऐसे शायर और
कवि हुए जिन्होंने केवल भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी अपनी शायरी और
काव्य पाठ से न सिर्फ लोगों का दिल जीता बल्कि समसामायिक घटनाओं,
इतिहासों का सजीव चित्रण करते रहे।
वर्तमान समय में भी बाराबंकी की सरजमी कवियों, शायरों को पालित एवं
पोषित कर रही है। गजेन्द्र प्रियंाशु, डा. अनिल बौझड़, निहाल रिजवी,
उस्मान मिनई, फैज कुमार आदि लोगों की शायरियों, कविताओं को लोग सिर्फ
सुनते ही नही बल्कि कंठस्थ भी करते हैं। मौजूदा समय में वीर रस के कवियों
में एक बड़ा नाम बाराबंकी की सरजमी से पूरे देश में सबके सामने है, वह हैं
ओज कवि विनय शुक्ला। वर्तमान हालातों, राष्ट्रभक्ति एवं सामाजिक समरसता
का अनुपम सामंजस्य लेकर जब विनय मंच पर उतरते हैं तो श्रोता उनके सुरों
से ताल मिलाए बिना नही रह पाते। पेश हैं ओज कवि विनय शुक्ला से मुलाकात
के कुछ खास अंश-
प्रश्न: आपका जन्म कब और कहां हुआ? शिक्षा एवं पारिवारिक परिदृश्य के
बारे में कुछ बताये?
उत्तर: मेरा जन्म 23 अगस्त 1977 को कस्बा व तहसील रामनगर में हुआ था।
कानपुर विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। पिता जी केन्द्रीय
नौकरी में थे। शुरुआत से ही परिवार में कवि सम्मेलनों के प्रति काफी
रुझान है। एक खास वाक्या याद आता है। जब पिता जी जम्मू काश्मीर में तैनात
थे। उस वक्त चिट्ठियांे से घर के हाल चाल जाने जाते हैं। जब भी पिता जी
काश्मीर से घर तक चिट्ठी भेजते थे। तो घर के सभी सदस्यों का हालचाल वे
बड़े काव्यात्मक ढंग से पूंछते थे। तो यह चीज बचपन से ही घर में थी।
प्रश्न: सबसे पहले किस मंच से आप ने काव्य पाठ किया?
उत्तर: सन् 1996 में बाराबंकी नगर के सिटी इण्टर कालेज में आहूत हुए कवि
सम्मेलन में मुझे काव्य पाठ करने का प्रथम अवसर प्राप्त हुआ। उसके बाद जो
कारवंा शुरु हुआ वो आज भी बदस्तूर जारी है।
प्रश्न: जब काव्य पाठ की शुरुआत की तो क्या लोगों के ताने भी सुनने पड़े ?
आखिरकार एक कवि का उदय कैसे हुआ ?
उत्तर: सबसे पहले मैने गरीबी पर लिखा था। जब अपने मित्रों, परिवारजनों व
अन्य लोगों को अपनी कविता, जो शायद दस बारह पंक्तियों की थी, सुनाया तो
कुछ एक ने कहा पागल हो गये हो का। मैं कोई हिन्दी का बहुत बड़ा जानकार नही
था। लेकिन उस वक्त जो हालात देश में पैदा हो रहे थे। उन हालातों पर लोगों
को जागरुक करने की मन में ठानी। बस फिर क्या था। धीरे-धीरे जो भाव, विचार
और सुझाव मन में आते थे उनको कागज पर लयबद्ध करना शुरु कर दिया। आज भी जब
देश की परिस्थितियां सामाजिक समरसता पर आघात करती हुई नजर आती हैं। तो
अपने आप अंधर बैठा कवि कुछ लिखने को बेकल हो उठता है।
ना मैं कामी नारी के मद-यौवन का श्रृंगार लिखूं, प्रेम मिलन के गीत लिखूं
ना प्रीतम का प्यार लिखूं।
मेरी कविता भारत मां के चरणों की पुष्पांजलि है, अमर शहीदों के बलिदानों
को कविता श्रद्धांजलि है।।
प्रश्न: वर्तमान समय में कुछ ओज कवियों द्वारा कभी कभार ऐसी भाषा का
प्रयोग किया जाता है। जो सामाजिक समरसता को पूरी तरह धूल धूसरित कर देता
है। इस सम्बंध में आपका क्या कहना है ?
उत्तर: मेरा मानना है कि ओज रस से ओत-प्रोत कविता कभी भी दंगे की भाषा
में नही होनी चाहिये। मैं अपनी कविताओं में खासकर ध्यान रखता हूं कि
राष्ट्रीयता भी साफ एवं स्पष्ट शब्दो में हो और सामाजिक समरसता का भी भाव
परिलक्षित हो।
मेरी कविता ज्ञान न देती राजा या सम्राटों को, हरित क्रांति अभियान न
देती, नागफनी के कांटो को।
मेरी कविता जयचंदो के जाप नहीं कर सकती है, क्योंकि मेरी पीढ़ी मुझको माफ
नही कर सकती।।
प्रश्न: वीर रस की कविताएं प्रस्तुत करने का भाव कैसे पैदा हुआ। आप आदर्श
किसे मानते हैं ?
उत्तर: बताया कि जिस समय मैनें लिखना शुरू किया, उस वक्त देश की राजनीतिक
परिस्थितियां बड़ी तेजी से बदल रही थीं। जनता में एक उत्साह था वीर रस की
कविताओं के प्रति। उस समय मंचों पर वेदव्रत बाजपेई और डा. हरिओम पंवार
जैसे पुरोधाओं का दबदबा था। दोनों वरिष्ठ कविगण मेरे आदर्श स्वरूप हैं।
प्रश्न: 20 वर्ष पहले जैसे कवि सम्मेलन हुआ करते थे, क्या अब भी वैसे ही
होते हैं या कुछ अंतर आया ?
उत्तर: पहले कवि सम्मेलन व्यावसायिक नहीं होते थे। अब व्यवसायीकरण का
बोलबाला है। कवि सम्मेलनों का प्रारूप बदल चुका है। अब आयोजकों के
हितार्थ एवं सेवार्थ कविता पाठ करनी पड़ती है। यह सत्य है और इसको नकारा
नहीं जा सकता। ओज कविता में इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि हमारी
कविता से किसी की भावनाओं को ठेस न पहुंचे।
प्रश्न: आगामी कविता के कुछ अंश क्या आप साझा करना चाहेंगे ?
उत्तर: बिल्कुल, क्योंकि कविता पाठ से पहले श्रोताओं के सुझाव हमेशा एक
नई दिशा देने का काम करते हैं। वैसे भी वीर रस की कविताओं से रक्त का
संचार दोगुना हो जाता है।
मेरी कविता साज नहीं है, महलों, राजघरानों की, कलम मेरी मोहताज नहीं है,
सरकारी अनुदानों की।
मैनें सपने बुने नहीं है, राजपथों की धूलों पर, पीड़ा के स्वर नहीं बिठाये
हैं, वासंती झूलों पर।
मेरे सर पर ताज नहीं है, सत्ता के सम्मानों का, मुझको तो बस प्यार मिला
है, देश भक्त दीवानों का।।
बाराबंकी। कभी जिंदगी का साज ऐसे तराने छोड़ता है, जिसकी ताल और लय में
इंसान झूम उठता है। किसी के दोष निकालना बड़ा आसान है। लेकिन खुद को इस
समाज के सामने प्रस्तुत करना बहुत मुश्किल। शब्दों की लयबद्धता, सुर एवं
ताल का सामंजस्य लेकर देश की वर्तमान परिस्थितियों को हुबहू जनता के
सामने मंचो से रखना कोई छोटी बात नही। बाराबंकी की सरजमी सिर्फ
क्रान्तिकारियों की कर्मस्थली ही नहीं रही, वरन देश के तमाम प्रसिद्ध
साहित्यकारांे, राजनीतिज्ञों एवं कवियों की जन्मस्थली भी रही है। फिर
चाहे वह संत बैजनाथ रहे हों या मशहूर शायर खुमार बाराबंकवी। शमशी मीनाई
साहब भी बाराबंकी में पैदा हुए। बाबा होल राय, गुरु प्रसाद सिंह ‘मृगेश’,
डा. सागर आजमी, बृजनन्दन पाण्डेय, पण्डित नागेश्वर दत्त पाण्डेय, पण्डित
गिरजा शंकर मिश्रा, निगार साहब, चौधरी अली मुबारक सहित तमाम ऐसे शायर और
कवि हुए जिन्होंने केवल भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी अपनी शायरी और
काव्य पाठ से न सिर्फ लोगों का दिल जीता बल्कि समसामायिक घटनाओं,
इतिहासों का सजीव चित्रण करते रहे।
वर्तमान समय में भी बाराबंकी की सरजमी कवियों, शायरों को पालित एवं
पोषित कर रही है। गजेन्द्र प्रियंाशु, डा. अनिल बौझड़, निहाल रिजवी,
उस्मान मिनई, फैज कुमार आदि लोगों की शायरियों, कविताओं को लोग सिर्फ
सुनते ही नही बल्कि कंठस्थ भी करते हैं। मौजूदा समय में वीर रस के कवियों
में एक बड़ा नाम बाराबंकी की सरजमी से पूरे देश में सबके सामने है, वह हैं
ओज कवि विनय शुक्ला। वर्तमान हालातों, राष्ट्रभक्ति एवं सामाजिक समरसता
का अनुपम सामंजस्य लेकर जब विनय मंच पर उतरते हैं तो श्रोता उनके सुरों
से ताल मिलाए बिना नही रह पाते। पेश हैं ओज कवि विनय शुक्ला से मुलाकात
के कुछ खास अंश-
प्रश्न: आपका जन्म कब और कहां हुआ? शिक्षा एवं पारिवारिक परिदृश्य के
बारे में कुछ बताये?
उत्तर: मेरा जन्म 23 अगस्त 1977 को कस्बा व तहसील रामनगर में हुआ था।
कानपुर विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। पिता जी केन्द्रीय
नौकरी में थे। शुरुआत से ही परिवार में कवि सम्मेलनों के प्रति काफी
रुझान है। एक खास वाक्या याद आता है। जब पिता जी जम्मू काश्मीर में तैनात
थे। उस वक्त चिट्ठियांे से घर के हाल चाल जाने जाते हैं। जब भी पिता जी
काश्मीर से घर तक चिट्ठी भेजते थे। तो घर के सभी सदस्यों का हालचाल वे
बड़े काव्यात्मक ढंग से पूंछते थे। तो यह चीज बचपन से ही घर में थी।
प्रश्न: सबसे पहले किस मंच से आप ने काव्य पाठ किया?
उत्तर: सन् 1996 में बाराबंकी नगर के सिटी इण्टर कालेज में आहूत हुए कवि
सम्मेलन में मुझे काव्य पाठ करने का प्रथम अवसर प्राप्त हुआ। उसके बाद जो
कारवंा शुरु हुआ वो आज भी बदस्तूर जारी है।
प्रश्न: जब काव्य पाठ की शुरुआत की तो क्या लोगों के ताने भी सुनने पड़े ?
आखिरकार एक कवि का उदय कैसे हुआ ?
उत्तर: सबसे पहले मैने गरीबी पर लिखा था। जब अपने मित्रों, परिवारजनों व
अन्य लोगों को अपनी कविता, जो शायद दस बारह पंक्तियों की थी, सुनाया तो
कुछ एक ने कहा पागल हो गये हो का। मैं कोई हिन्दी का बहुत बड़ा जानकार नही
था। लेकिन उस वक्त जो हालात देश में पैदा हो रहे थे। उन हालातों पर लोगों
को जागरुक करने की मन में ठानी। बस फिर क्या था। धीरे-धीरे जो भाव, विचार
और सुझाव मन में आते थे उनको कागज पर लयबद्ध करना शुरु कर दिया। आज भी जब
देश की परिस्थितियां सामाजिक समरसता पर आघात करती हुई नजर आती हैं। तो
अपने आप अंधर बैठा कवि कुछ लिखने को बेकल हो उठता है।
ना मैं कामी नारी के मद-यौवन का श्रृंगार लिखूं, प्रेम मिलन के गीत लिखूं
ना प्रीतम का प्यार लिखूं।
मेरी कविता भारत मां के चरणों की पुष्पांजलि है, अमर शहीदों के बलिदानों
को कविता श्रद्धांजलि है।।
प्रश्न: वर्तमान समय में कुछ ओज कवियों द्वारा कभी कभार ऐसी भाषा का
प्रयोग किया जाता है। जो सामाजिक समरसता को पूरी तरह धूल धूसरित कर देता
है। इस सम्बंध में आपका क्या कहना है ?
उत्तर: मेरा मानना है कि ओज रस से ओत-प्रोत कविता कभी भी दंगे की भाषा
में नही होनी चाहिये। मैं अपनी कविताओं में खासकर ध्यान रखता हूं कि
राष्ट्रीयता भी साफ एवं स्पष्ट शब्दो में हो और सामाजिक समरसता का भी भाव
परिलक्षित हो।
मेरी कविता ज्ञान न देती राजा या सम्राटों को, हरित क्रांति अभियान न
देती, नागफनी के कांटो को।
मेरी कविता जयचंदो के जाप नहीं कर सकती है, क्योंकि मेरी पीढ़ी मुझको माफ
नही कर सकती।।
प्रश्न: वीर रस की कविताएं प्रस्तुत करने का भाव कैसे पैदा हुआ। आप आदर्श
किसे मानते हैं ?
उत्तर: बताया कि जिस समय मैनें लिखना शुरू किया, उस वक्त देश की राजनीतिक
परिस्थितियां बड़ी तेजी से बदल रही थीं। जनता में एक उत्साह था वीर रस की
कविताओं के प्रति। उस समय मंचों पर वेदव्रत बाजपेई और डा. हरिओम पंवार
जैसे पुरोधाओं का दबदबा था। दोनों वरिष्ठ कविगण मेरे आदर्श स्वरूप हैं।
प्रश्न: 20 वर्ष पहले जैसे कवि सम्मेलन हुआ करते थे, क्या अब भी वैसे ही
होते हैं या कुछ अंतर आया ?
उत्तर: पहले कवि सम्मेलन व्यावसायिक नहीं होते थे। अब व्यवसायीकरण का
बोलबाला है। कवि सम्मेलनों का प्रारूप बदल चुका है। अब आयोजकों के
हितार्थ एवं सेवार्थ कविता पाठ करनी पड़ती है। यह सत्य है और इसको नकारा
नहीं जा सकता। ओज कविता में इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि हमारी
कविता से किसी की भावनाओं को ठेस न पहुंचे।
प्रश्न: आगामी कविता के कुछ अंश क्या आप साझा करना चाहेंगे ?
उत्तर: बिल्कुल, क्योंकि कविता पाठ से पहले श्रोताओं के सुझाव हमेशा एक
नई दिशा देने का काम करते हैं। वैसे भी वीर रस की कविताओं से रक्त का
संचार दोगुना हो जाता है।
मेरी कविता साज नहीं है, महलों, राजघरानों की, कलम मेरी मोहताज नहीं है,
सरकारी अनुदानों की।
मैनें सपने बुने नहीं है, राजपथों की धूलों पर, पीड़ा के स्वर नहीं बिठाये
हैं, वासंती झूलों पर।
मेरे सर पर ताज नहीं है, सत्ता के सम्मानों का, मुझको तो बस प्यार मिला
है, देश भक्त दीवानों का।।

